मंगलवार, 30 अप्रैल 2024

एक मुट्ठी चाँवल.. की बहुत ही रोचक लेकिन शिक्षाप्रद कहानी ....... जरूर पढिये

 

जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन


किसी नगर में एक भिखारिन एक गृहस्थी के यहाँ नित्य भीख मांगने जाती थी। गृहिणी नित्य ही उसे एक मुठ्ठी चावल दे दिया करती थी। यह बुढ़िया का दैनिक कार्य था और महीनों से नहीं कई वर्षों से यह कार्य बिना रुकावट के चल रहा था। एक दिन भिखारिन चावलों की भीख खाकर ज्यों ही द्वार से मुड़ी, गली में गृहिणी का ढाई वर्ष का बालक खेलता हुआ दिखाई दिया। बालक के गले में एक सोने की जंजीर थी। बुढ़िया की नीयत बदलते देर न लगी। इधर-उधर दृष्टि दौड़ाई, गली में कोई और दिखाई नहीं पड़ा। बुढ़िया ने बालक के गले से जंजीर ले ली और चलती बनी।

 घर पहुँची, अपनी भीख यथा स्थान रखी और बैठ गई। सोचने लगी,"जंजीर को सुनार के पास ले जाऊंगी और इसे बेचकर पैसे खरे करुँगी।" यह सोचकर जंजीर एक कोने में एक ईंट के नीचे रख दी। भोजन बनाकर और खा पीकर सो गई। प्रातःकाल उठी,शौचादि से निवृत्त हुई तो जंजीर के सम्बन्ध में जो विचार सुनार के पास ले जाकर धन राशि बटोरने का आया था उसमें तुरंत परिवर्तन आ गया। बुढ़िया के मन में बड़ा क्षोभ पैदा हो गया। सोचने लगी-"यह पाप मेरे से क्यों हो गया? क्या मुँह लेकर उस घर पर जाऊंगी?" सोचते-सोचते बुढ़िया ने निर्णय किया कि जंजीर वापिस ले जाकर उस गृहिणी को दे आयेगी। बुढ़िया जंजीर लेकर सीधी वहीं पहुँची। द्वार पर बालक की माँ खड़ी थी। उसके पांवों में गिरकर हाथ जोड़कर बोली-"आप मेरे अन्नदाता हैं। वर्षों से मैं आपके अन्न पर पल रही हूँ। कल मुझसे बड़ा अपराध हो गया, क्षमा करें और बालक की यह जंजीर ले लें।"

जंजीर को हाथ में लेकर गृहिणी ने आश्चर्य से पूछा-"क्या बात है? यह जंजीर तुम्हें कहाँ मिली?" भिखारिन बोली-"यह जंजीर मैंने ही बालक के गले से उतार ली थी लेकिन अब मैं बहुत पछता रही हूँ कि ऐसा पाप मैं क्यों कर बैठी?"

गृहिणी बोली-"नहीं, यह नहीं हो सकता। तुमने जंजीर नहीं निकाली। यह काम किसी और का है, तुम्हारा नहीं। तुम उस चोर को बचाने के लिए यह नाटक कर रही हो।"

"नहीं, बहिन जी, मैं ही चोर हूँ। कल मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी। आज प्रातः मुझे फिर से ज्ञान हुआ और अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए मैंने आपके सामने सच्चाई रखना आवश्यक समझा," भिखारिन ने उत्तर दिया। गृहिणी यह सुनकर अवाक् रह गई।

भिखारिन ने पूछा-"क्षमा करें, क्या आप मुझे बताने की कृपा करेंगी कि कल जो चावल मुझे दिये थे वे कहाँ से मोल लिये गये हैं।"

गृहिणी ने अपने पति से पूछा तो पता लगा कि एक व्यक्ति कहीं से चावल लाया था और अमुक पुल के पास बहुत सस्ते दामों में बेच रहा था। हो सकता है वह चुराकर लाया हो। उन्हीं चोरी के चावलों की भीख दी गई थी।

भिखारिन बोली-"चोरी का अन्न पाकर ही मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी और इसी कारण मैं जंजीर चुराकर ले गई। वह अन्न जब मल के रूप में शरीर से निकल गया और शरीर निर्मल हो गया तब मेरी बुद्धि ठिकाने आई और मेरे मन ने निर्णय किया कि मैंने बहुत बड़ा पाप किया है। मुझे यह जंजीर वापिस देकर क्षमा माँग लेनी चाहिए।"

गृहिणी तथा उसके पति ने जब भिखारिन के मनोभावों को सुना तो बड़े अचम्भे में पड गये। भिखारिन फिर बोली-"चोरी के अन्न में से एक मुठ्ठी भर चावल पाने से मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो सकती है तो वह सभी चावल खाकर आपके परिवार की क्या दशा होगी, अतः फेंक दीजिए उन सभी चावलों को।" गृहिणी ने तुरन्त उन चावलों को बाहर फेंक दिया।"

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सोमवार, 29 अप्रैल 2024

जानिये क्यों.....माता सीता ने चण्डी का रूप धरा


जब माता सीता बन गई चण्डी


एक समय की बात है कि भगवान् श्रीराम राजसभा में विराज रहे थे|उसी समय विभीषण वहाँ पहुंचे। वे बहुत भयभीत और हडबड़ी में लग रहे थे। सभा में प्रवेश करते ही वे कहने लगे – हे राम ! मुझे बचाइये, कुम्भकर्ण का बेटा मूलकासुर आफत ढा रहा है। अब लगता है, न लंका बचेगी और न मेरा राज पाठ।

भगवान श्री राम द्वारा ढांढस बंधाये जाने और पूरी बात बताये जाने पर विभीषण ने बताया कि कुम्भकर्ण का एक बेटा मूल नक्षत्र में पैदा हुआ था। इसलिये उस का नाम मूलकासुर रखा गया है। इसे अशुभ जानकर कुंभकर्ण ने जंगल में फिंकवा दिया था।

जंगल में मधुमक्खियों ने मूलकासुर को पाल लिया। मूलकासुर बड़ा हुआ तो उसने कठोर तपस्या कर के ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया, अब उनके दिये वर और बल के घमंड में भयानक उत्पात मचा रखा है। जब जंगल में उसे पता चला कि आपने उसके खानदान का सफाया कर लंका जीत ली और राजपाट मुझे सौंप दिया है वह तब से भन्नाया हुआ है।

भगवन आपने जिस दिन मुझे राज पाठ सौंपा उसके कुछ दिन बाद ही वह पाताल वासियों के साथ लंका पहुँच कर मुझ पर धावा बोल दिया। मैंने छः महिने तक मुकाबला किया पर ब्र्ह्मा जी के वरदान ने उसे इतना ताकत वर बना दिया है कि मुझे भागना पड़ा।

अपने बेटे, मन्त्रियों तथा स्त्री के साथ किसी प्रकार सुरंग के जरिये भाग कर यहाँ पहुँचा हूँ। उसने कहा कि ‘पहले धोखेबाज भेदिया विभीषण को मारुंगा फिर पिता की हत्या करने वाले राम को भी मार डालूँगा। वह आपके पास भी आता ही होगा। समय कम है, लंका और अयोध्या दोनों खतरे में हैं। जो उचित समझते हों तुरन्त कीजिये। भक्त की पुकार सुन श्रीराम जी, हनुमान तथा लक्ष्मण सहित सेना को तैयार कर पुष्पक यान पर चढ़ लंका की ओर चल पड़े।

मूलकासुर को श्रीराम चंद्र के आने की बात मालूम हुई, वह भी सेना लेकर लड़ने के लिये लंका के बाहर आ डटा। भयानक युद्ध छिड़ गया और सात दिनों तक घोर युद्ध होता रहा। मूलकासुर भगवान श्री राम की सेना पर अकेले ही भारी पड़ रहा था। अयोध्या से सुमन्त्र आदि सभी मन्त्री भी आ पहुँचे। हनुमान् जी भी संजीवनी लाकर वानरों, भालुओं तथा मानुषी सेना को जिलाते जा रहे थे। सब कुछ होते हुये भी पर युद्ध का नतीजा उनके पक्ष में जाता नहीं दीख रहा था अतः भगवान् चिन्ता में थे।

विभीषण ने बताया कि रोजाना मूलकासुर तंत्र साधना करने गुप्त गुफा में जाता है। उसी समय ब्रह्मा जी वहाँ आये और भगवान से कहने लगे – ‘रघुनन्दन ! इसे तो मैंने स्त्री के हाथों मरने का वरदान दिया है। आपका प्रयास बेकार ही जायेगा। श्रीराम, इससे संबंधित एक बात और है, उसे भी जान लेना फायदे मंद हो सकता है। जब इसके भाई-बंधु लंका युद्ध में मारे जा चुके तो एक दिन इसने मुनियों के बीच दुखी हो कर कहा, ‘चण्डी सीता के कारण मेरा समूचा कुल नष्ट हुआ’। इस पर एक मुनि ने नाराज होकर उसे शाप दे दिया – ‘दुष्ट ! तुने जिसे चण्डी कहा है, वही सीता तेरी जान लेगी।' मुनि का इतना कहना था कि वह उन्हें खा गया। यह देखकर बाकी मुनि उस के डर से चुप चाप खिसक गये। तो हे राम, अब कोई दूसरा उपाय नहीं है।अब तो केवल सीता ही इसका वध कर सकती हैं। आप उन्हें यहाँ बुला कर इसका वध करवाइये, इतना कह कर ब्रह्मा जी चले गये।भगवान् श्रीराम ने हनुमान जी और गरुड़ को तुरन्त पुष्पक विमान से सीता जी को लाने भेजा।

सीता देवी-देवताओं की मन्नत मनातीं, तुलसी, शिव-प्रतिमा, पीपल आदि के फेरे लगातीं, ब्राह्मणों से ‘पाठ, रुद्रीय’ का जप करातीं, दुर्गा जी की पूजा करती कि विजयी श्री राम शीघ्र लौटें। तभी गरुड़ और हनुमान् जी उनके पास पहुँचे और राम जी का संदेश सुनाया। पति के संदेश को सुन कर सीता तुरन्त चल दीं। श्री राम ने उन्हें मूलकासुर के बारे में सारा कुछ बताया। फिर तो भगवती सीता को गुस्सा आ गया । उनके शरीर से एक दूसरी तामसी शक्ति निकल पड़ी, उसका स्वर बड़ा भयानक था। यह छाया सीता चण्डी के वेश में लंका की ओर बढ चलीं। 

इधर श्री राम ने वानर सेना को इशारा किया कि मूलकासुर जो तांत्रिक क्रियाएं कर रहा है उसको उसकी गुप्त गुफा में जा कर तहस नहस करें। वानर गुफा के भीतर पहुंच कर उत्पात मचाने लगे तो मूलकासुर दांत किट किटाता हुआ सब छोड़ छाड़ कर वानर सेना के पीछे दौड़ा। हड़बड़ी में उसका मुकुट गिर पड़ा। फिर भी भागता हुआ वह युद्ध के मैदान में आ गया।

युद्ध के मैदान में छाया सीता को देखकर मूलकासुर गरजा, तू कौन ? अभी भाग जा, मैं औरतों पर मर्दानगी नही दिखाता। छाया सीता ने भी भीषण आवाज करते हुये कहा, ‘मैं तुम्हारी मौत-चण्डी हूँ, तूने मेरा पक्ष लेने वाले मुनियों और ब्राह्मणों को खा डाला था, अब मैं तुम्हें मार कर उसका बदला चुकाउंगी। इतना कह कर छाया सीता ने मूलकासुर पर पाँच बाण चलाये। मूलकासुर ने भी जवाब में बाण चलाये। कुछ देर तक घोर युद्द हुआ पर अन्त में ‘चण्डिकास्त्र’ चला कर छाया सीता ने मूलकासुर का सिर उड़ा दिया। वह लंका के दरवाजे पर जा गिरा।

राक्षस हाहाकार करते हुए इधर उधर भाग खड़े हुए। छाया सीता लौट कर सीता के शरीर में प्रवेश कर गयी। मूलका सुर से दुखी लंका की जनता ने मां सीता की जय जयकार की और विभीषन ने उन्हें धन्यवाद दिया। कुछ दिनों तक लंका में रहकर श्री राम सीता सहित पुष्पक विमान से अयोध्या लौट आये।

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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2024

पिता के स्वरुप का..... भगवान गणपति जी के द्वारा वर्णन......

पिता का स्वरुप



एक बार गणेश जी ने भगवान शिव जी से कहा -

पिता जी ! आप यह "चिता-भस्म" लगा कर मुण्डमाला धारण कर  अच्छे नहीं लगते! मेरी माता "गौरी" अपूर्व सुन्दरी और आप उनके साथ इस भयंकर "रूप" में ?


 पिताजी ! आप एक बार कृपा कर के अपने सुन्दर रूप में माता के  सम्मुख आयें, जिससे हम आपका असली स्वरूप देख सकें |


 भगवान शिव जी मुस्कुराये और "गणेश" की बात मान ली | कुछ समय बाद जब शिव जी "स्नान" कर के लौटे तो उनके शरीर पर "भस्म" नहीं थी| बिखरी जटाएँ, सँवरी हुईं "मुण्डमाला" उतरी हुई थी|


सभी देवी-देवता, यक्ष, गन्धर्व, शिवगण उन्हें "अपलक" देखते रह गये, वो ऐसा रूप था कि "मोहिनी" अवतार रूप भी फीका पड़ जाए |


भगवान शिव ने अपना यह रूप कभी प्रकट नहीं किया था | शिव जी का ऐसा अतुलनीय रूप कि करोड़ों कामदेव को भी "मलिन" कर रहा था |


गणेश अपने पिता की इस मनमोहक "छवि" को देख कर    "स्तब्ध" रह गये| मस्तक झुका कर बोले मुझे क्षमा करें पिता जी ,परन्तु अब आप अपने "पूर्व रूप" को धारण कर लीजिए |


 भगवान शिव मुस्कुराये और पूछा, "क्यों पुत्र ?" अभी भी तुमने ही मुझे इस रूप में देखने की इच्छा प्रकट की थी| अब पुनः "पूर्व स्वरूप" में आने की बात क्यों ?


 गणेश जी ने मस्तक झुकाये हुए ही कहा, क्षमा करें पिता श्री, "मेरी माता" से "सुन्दर" कोई और दिखे, मैं ऐसा कदापि नहीं चाहता| शिव जी हँसे और अपने पुराने स्वरूप में लौट आये |


"पौराणिक ऋषि" इस प्रसंग का सार स्पष्ट करते हुए कहते है 

आज भी ऐसा ही होता है,"पिता" , "रुद्र रूप" में रहता है क्योंकि उसके ऊपर परिवार की ज़िम्मेदारियाँ अपने परिवार का "रक्षण" उनके "मान सम्मान" का ख्याल रखना होता है, तो थोड़ा "कठोर" रहता है|


 जबकि "माँ सौम्य, प्यार, लाड़, स्नेह उनसे बातचीत कर के प्यार दे कर उस "कठोरता" का  सन्तुलन बनाए रखती है| इसलिए सुन्दर होता है"माँ" का "स्वरुप"|


 पिता के ऊपर से भी ज़िम्मेदारियों का बोझ हट जाए तो वो भी  बहुत "सुन्दर" दिखता है|


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गुरुवार, 25 अप्रैल 2024

भगवान पर विश्वास...वह हमेशा आपको अपने हाथों में थामे हुए है

भगवान पर विश्वास



यह कहानी एक ऐसे पर्वतारोही की है जो सबसे ऊँचे पर्वत पर विजय पाना चाहता था। 

कई सालों की कड़ी मेहनत के बाद उसने अपना साहसिक अभियान शुरु किया। पर वह यह उपलब्धि किसी के साथ साझा नहीं करना चाहता था, अत: उसने अकेले ही चढ़ाई करने का निश्चय किया। उसने पर्वत पर चढ़ना आरंभ किया, जल्दी ही शाम ढलने लगी। पर वह विश्राम के लिए तम्बू में ठहरने की जगह अंधेरा होने तक चढ़ाई करता रहा। घने अंधकार के कारण वह कुछ भी देख नहीं पा रहा था। हाथ को हाथ भी सुझाई नहीं दे रहा था। चंद्रमा और तारे सब बादलों की चादर से ढके हुए थे। वह निरंतर चढ़ता हुआ पर्वत की चोटी से कुछ ही फुट के फासले पर था कि तभी अचानक उसका पैर फिसला और वह तेजी से नीचे की तरफ गिरने लगा। गिरते हुए उसे अपने जीवन के सभी अच्छे और बुरे दौर चलचित्र की तरह दिखाई देने लगे। उसे अपनी मृत्यु बहुत नजदीक लग रही थी, तभी उसकी कमर से बंधी रस्सी ने झटके से उसे रोक दिया। उसका शरीर केवल उस रस्सी के सहारे हवा में झूल रहा था। उसी क्षण वह जोर से चिल्लाया: ‘भगवान मेरी मदद करो!’ तभी अचानक एक गहरी आवाज आकाश में गूँजी:- तुम मुझ से क्या चाहते हो ?

पर्वतारोही बोला - भगवन् मेरी रक्षा कीजिए!

- क्या तुम्हें सच में विश्वास है कि मैं तुम्हारी रक्षा कर सकता हूँ ?

वह बोला - हाँ, भगवन् मुझे आप पर पूरा विश्वास है ।

- ठीक है, अगर तुम्हें मुझ पर विश्वास है तो अपनी कमर से बंधी रस्सी काट दो.....

कुछ क्षण के लिए वहाँ एक चुप्पी सी छा गई और उस पर्वतारोही ने अपनी पूरी शक्ति से रस्सी को पकड़े रहने का निश्चय कर लिया।

अगले दिन बचाव दल को एक रस्सी के सहारे लटका हुआ एक पर्वतारोही का ठंड से जमा हुआ शव मिला । उसके हाथ रस्सी को मजबूती से थामे थे... और वह धरती से केवल 5 फुट की ऊँचाई पर था।

और आप? आप अपनी रस्सी से कितने जुड़े हुए हैं । क्या आप अपनी रस्सी को छोड़ेंगे? 

भगवान पर विश्वास रखिए। कभी भी यह नहीं सोचिए कि वह आपको भूल गया है या उसने आपका साथ छोड़ दिया है ।

याद रखिए कि वह हमेशा आपको अपने हाथों में थामे हुए है !


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बुधवार, 24 अप्रैल 2024

बहुत ही अजीब होती हैं ये बिटियाँ....दिल को छू लेने वाली पिता और बेटी की कहानी

 

दिल को छू लेने वाली पिता और बेटी की कहानी


पाँच साल की बेटी मंडी में गोल गप्पे खाने के लिए मचल गई। “किस भाव से दिए भाई?” पापा नें सवाल् किया। “10 रूपये के 8 दिए हैं। गोल गप्पे वाले ने जवाब दिया… पापा को मालूम नहीं था गोलगप्पे इतने महँगे हो गये है…. जब वे खाया करते थे तब तो एक रुपये के 10 मिला करते थे। पापा ने जेब मे हाथ डाला 15 रुपये बचे थे। बाकी रुपये घर की आवश्यकता का सामान लेने में खर्च हो गए थे। उनका गांव शहर से दूर है 10 रुपये तो बस किराए में लग जाने है। “नहीं भई 5 रुपये में 10 दो तो ठीक है वरना नही लेने।”


यह सुनकर बेटी नें मुँह फुला लिया… “अरे अब चलो भी, नहीं लेने इतने महँगे। ” पापा के माथे पर रेखा उभर आयीं… “अरे खा लेने दो ना साहब…” अभी आपके घर में है तो आपसे लाड़ भी कर सकती है… कल को पराये घर चली गयी तो पता नहीं ऐसे मचल पायेगी या नहीं. … तब आप भी तरसोगे बिटिया की फरमाइश पूरी करने को… गोलगप्पे वाले के शब्द थे तो चुभने वाले पर उन्हें सुनकर पापा को अपनी बड़ी बेटी की याद आ गयी| 


जिसकी शादी उसने तीन साल पहले एक खाते -पीते पढ़े लिखे परिवार में की थी.. 


उन्होंने पहले साल से ही उसे छोटी छोटी बातों पर सताना शुरू कर दिया था…


दो साल तक वह मुट्ठी भरभर के रुपये उनके मुँह में ठूँसता रहा पर उनका पेट बढ़ता ही चला गया ….


और अंत में एक दिन सीढियों से गिर कर बेटी की मौत का समाचार ही मायके पहुँचा….


आज वह छटपटाता है कि उसकी वह बेटी फिर से उसके पास लौट आये..? और वह चुन चुन कर उसकी सारी अधूरी इच्छाएँ पूरी कर दे…


पर वह अच्छी तरह जानता है कि अब यह असंभव है. “दे दूँ क्या बाबूजी


गोलगप्पे वाले की आवाज से पापा की तंद्रा टूटी…


“रुको भाई दो मिनिट …. पापा पास ही पंसारी की दुकान थी उस पर गए जहाँ से आवश्यकता का सामान खरीदा था। खरीदी गई पाँच किलो चीनी में से एक किलो चीनी वापस की तो 40 रुपये जेब मे बढ़ गए।


फिर ठेले पर आकर पापा ने डबडबायी आँखें पोंछते हुए कहा अब खिला दे भाई। हाँ तीखा जरा कम डालना। मेरी बिटिया बहुत नाजुक है…. सुनकर पाँच वर्ष की गुड़िया जैसी बेटी की आंखों में चमक आ गई और पापा का हाथ कस कर पकड़ लिया।


जब तक बेटी हमारे घर है उनकी हर इच्छा अवश्य पूरी करे,...


क्या पता आगे कोई इच्छा पूरी हो पाये या ना हो पाये ।


ये बेटियां भी कितनी विचित्र होती हैं जब ससुराल में होती हैं तब माइके जाने को तरसती हैं….


सोचती हैं कि घर जाकर माँ को ये बताऊँगी पापा से ये मांगूंगी बहिन से ये कहूँगी भाई को सब सिखाऊंगी और मौज मस्ती


कउ करुँगी…


लेकिन


जब सच में मायके जाती हैं तो एकदम शांत हो जाती है किसी से कुछ भी नहीं बोलती….


बस माँ बाप भाई बहन से गले मिलती है। बहुत बहुत खुश होती है। भूल जाती है कुछ पल के लिए पति ससुराल…..


क्योंकि एक अनोखा प्यार होता है मायके में एक अजीब कशिश होती है मायके में….. ससुराल में कितना भी प्यार मिले…..


माँ बाप की एक मुस्कान को तरसती है ये बेटियां….


ससुराल में कितना भी रोयें पर मायके में एक भी आंसूं नहीं बहाती ये बेटियां….


क्योंकि बेटियों का सिर्फ एक ही आंसू माँ बाप भाई बहन को हिला देता है रुला देता है…..


कितनी अजीब है ये बेटियां कितनी नटखट है ये बेटियां भगवान की अनमोल देंन हैं ये बेटियां ……


हो सके तो बेटियों को बहुत प्यार दें उन्हें कभी भी न रुलाये क्योंकि ये अनमोल बेटी दो परिवार जोड़ती है दो रिश्तों को साथ लाती है। अपने प्यार और मुस्कान से।


हम चाहते हैं कि सभी बेटियां खुश रहें सदैव भले ही हो वो मायके में या ससुराल में।

सोमवार, 22 अप्रैल 2024

एक रोचक कहानी पढियेगा जरूर .....नीयत में होगी खोट तो भगवान करेंगे चोट


नीयत में होगी खोट तो भगवान करेंगे चोट



कुछ धनी किसानों ने मिलकर खेती के लिए एक कुँआ बनवाया| सबकी अपनी-अपनी बारी बंधी थी| कुंआ एक निर्धन किसान के खेतों के पास था,लेकिन उसे पानी नहीं मिलता था| धनी किसानों ने खेतों में बीज बोकर सिंचाई शुरू कर दी| निर्धन किसान बीज भी नहीं बो पा रहा था| उसने धनवानों की बड़ी आरजू मिन्नत की लेकिन एक न सुनी गई| निर्धन बरसात से पहले खेत में बीज भी न बो पाया तो भूखा मर जाएगा| यह सोचकर अमीर किसानों ने उस पर दया की और बीज बोने के लिए एक रात तीन घंटे की सिंचाई का मौका दे दिया| उसे एक रात के लिए ही मौका मिला था| वह रात बेकार न जाए यह सोचकर एक किसान ने मजबूत बैलों का एक जोड़ा भी दे दिया ताकि वह पर्याप्त पानी निकाल ले|


निर्धन तो जैसे इस मौके की तलाश में था| उसने सोचा इन लोगों ने उसे बहुत सताया है| आज तीन घंटे में ही इतना पानी निकाल लूंगा कि कुछ बचेगा ही नहीं| इसी नीयत से उसने बैलों को जोता पानी निकालने लगा| गाधी पर बैठा और बैलों को चलाकर पानी निकालने लगा| पानी निकालने का नियम है कि बीच-बीच में हौज और नाली की जांच कर लेनी चाहिए कि पानी खेतों तक जा रहा है या नहीं| लेकिन उसके मन में तो खोट था| 

उसने सोचा हौज और नाली सब दुरुस्त ही होंगी| बैलों को छोड़कर गया, तो वे खड़े हो जाएंगे| उसे तो कुँआ खाली करना था| ताबडतोड़ बैलों परडंडे बरसाता रहा| डंडे के चोट से बैल भागते रहे और पानी निकलता रहा| तीन घंटे बाद दूसरा किसान पहुंच गया जिसकी पानी निकालने की बारी थी| उसने बैल खोल लिए और अपने खेत देखने चला| वहां पहुंचकर वह छाती पीटकर रोने लगा| खेतों में तो एक बूंद पानी नहीं पहुंचा था| उसने हौज और नाली की तो चिंता ही नहीं की थी| सारा पानी उसके खेत में जाने की बजाय कुँए के पास एक गड़ढ़े में जमा होता रहा| 


अंधेरे में वह किसान खुद उस गडढ़े में गिर गया| पीछे-पीछे आते बैल भी उसके ऊपर गिर पड़े| वह चिल्लाया तो दूसरा किसान भागकर आया और उसे किसी तरह निकाला| दूसरे किसान ने कहा- परोपकार के बदले नीयत खराब रखने की यही सजा होती है| तुम कुँआ खाली करना चाहते थे| यह पानी तो रिसकर वापस कुँए में चला जाएगा लेकिन तुम्हें अब कोई फिर कभी न अपने बैल देगा, न ही कुँआ| तृष्णा यही है| मानव देह बड़ी मुश्किल से मिलता है| इंद्रियां रूपी बैल मिले हैं हमें अपना जीवन सत्कर्मों से सींचने के लिए लेकिन तृष्णा में फंसा मन सारी बेईमानी पर उतर आता है|

परोपकार को भी नहीं समझता ईश्वर से क्या छुपा| वह कर्मों का फल देते हैं लेकिन फल देने से पहले परीक्षा की भी परंपरा है| उपकार के बदले अपकार नहीं बल्कि ऋणी होना चाहिए तभी प्रभु आपको इतना क्षमतावान बनाएंगे कि आप किसी पर उपकार का सुख ले सकें,जो कहते हैं कि लाख जतन से भी प्रभु कृपालु नहीं हो रहे, उन्हें विचारना चाहिए कि कहीं उनके कर्मों में कोई ऐसा दोष तो नहीं जिसकी वह किसान की तरह अनदेखी कर रहे हैं और भक्ति स्वीकर नहीं हो रही| 

एक रोचक कहानी पढियेगा जरूर 

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रविवार, 21 अप्रैल 2024

एक दिलचस्प और रोचक शिक्षाप्रद कहानी.... परहित का चिंतन

परहित का चिंतन



एक राजा था जिसे शिल्प कला अत्यंत प्रिय थी। वह मूर्तियों की खोज में देश-परदेस जाया करता था। इस प्रकार राजा ने कई मूर्तियाँ अपने राज महल में लाकर रखी हुई थीं और स्वयं उनकी देख रेख करवाते। सभी मूर्तियों में उन्हें तीन मूर्तियाँ जान से भी ज्यादा प्यारी थीं। सभी को पता था कि राजा को उनसे अत्यंत लगाव है। 


एक दिन जब एक सेवक इन मूर्तियों की सफाई कर रहा था तब गलती से उसके हाथों से उनमें से एक मूर्ति टूट गई। जब राजा को यह बात पता चली तो उन्हें बहुत क्रोध आया और उन्होंने उस सेवक को तुरन्त मृत्युदण्ड दे दिया। सजा सुनने के बाद सेवक ने तुरन्त अन्य दो मूर्तियों को भी तोड़ दिया। यह देख कर सभी को आश्चर्य हुआ। 


राजा ने उस सेवक से इसका कारण पूछा, तब उस सेवक ने कहा - "महाराज !! क्षमा कीजियेगा, यह मूर्तियाँ मिट्टी की बनी हैं, अत्यंत नाजुक हैं। अमरता का वरदान लेकर तो आई नहीं हैं। आज नहीं तो कल टूट ही जातीं। अगर मेरे जैसे किसी प्राणी से टूट जातीं तो उसे अकारण ही मृत्युदंड का भागी बनना पड़ता। मुझे तो मृत्यु दंड मिल ही चुका हैं इसलिए मैंने ही अन्य दो मूर्तियों को तोड़कर उन दो व्यक्तियों की जान बचा ली। 


यह सुनकर राजा की आँखे खुली की खुली रह गईं, उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने सेवक को सजा से मुक्त कर दिया। सेवक ने उन्हें साँसों का मूल्य सिखाया, साथ ही सिखाया कि न्यायाधीश के आसन पर बैठकर अपने निजी प्रेम के चलते छोटे से अपराध के लिए मृत्युदंड देना उस आसन का अपमान है। एक उच्च आसन पर बैठकर हमेशा उसका आदर करना चाहिये। राजा हो या कोई भी अगर उसे न्याय करने के लिए चुना गया है तो उसे न्याय के महत्व को समझना चाहिये। 


मूर्ति से राजा को प्रेम था लेकिन उसके लिए सेवक को मृत्युदंड देना न्याय के विरुद्ध था। न्याय की कुर्सी पर बैठकर किसी को भी अपनी भावनाओं से दूर हट कर फैसला देना चाहिये। राजा को समझ आ गया कि मुझसे कई गुना अच्छा तो वो यह सेवक था जिसने मृत्यु के इतना समीप होते हुए भी परहित का सोचा..!! 


राजा ने सेवक से पूछा कि अकारण मृत्यु को सामने पाकर भी तुमने ईश्वर को नही कोसा, तुम निडर रहे, इस संयम, समस्वस्भाव तथा दूरदृष्टि के गुणों के वहन की युक्ति क्या है ? 


सेवक ने बताया कि आपके यहाँ काम करने से पहले मैं एक अमीर सेठ के यहां नौकर था। मेरा सेठ मुझसे तो बहुत खुश था लेकिन जब भी कोई कटु अनुभव होता तो वह ईश्वर को बहुत गालियाँ देता था । 


एक दिन सेठ ककड़ी खा रहा था । संयोग से वह ककड़ी कड़वी थी। सेठ ने वह ककड़ी मुझे दे दी। मैंने उसे बड़े चाव से खाया - जैसे वह बहुत स्वादिष्ट हो। सेठ ने पूछा – “ ककड़ी तो बहुत कड़वी थी । भला तुम ऐसे कैसे खा गये तो मैने कहा सेठ जी आप मेरे मालिक हैं। रोज ही स्वादिष्ट भोजन देते हैं। अगर एक दिन कुछ कड़वा भी दे दिए तो उसे स्वीकार करने में क्या हर्ज है।" 


राजा जी इसी प्रकार अगर ईश्वर ने इतनी सुख–सम्पदाएँ दी है, और कभी कोई कटु अनुदान दे भी दे तो उसकी सद्भावना पर संदेह करना ठीक नहीं । 


जन्म, जीवनयापन तथा मृत्यु सब उसी की देन है। असल में यदि हम समझ सकें तो जीवन में जो कुछ भी होता है, सब ईश्वर की दया ही है। ईश्वर जो करता है अच्छे के लिए ही करता है| यदि सुख दुख को ईश्वर का प्रसाद समझकर संयम से ग्रहण करें तथा हर समय परिहित का चिंतन करें।  

एक दिलचस्प और रोचक शिक्षाप्रद कहानी....  परहित का चिंतन

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शनिवार, 20 अप्रैल 2024

क्या आप जानते है?....शास्त्रों में बताए गए 6 खास गुरुओं के बारे मे


शास्त्रों में बताए गए 6 खास गुरु


शास्त्रों में भी गुरु का स्थान सर्वोच्च बताया गया है| देवी-देवताओं के अवतारों ने भी गुरु से ही ज्ञान प्राप्त किया | रामायण और महाभारत में कई गुरु बताए गए है | श्रीराम ने वशिष्ठ और विश्वामित्र से ज्ञान प्राप्त किया था | श्रीकृष्ण ने सांदीपनि ऋषि को गुरु दक्षिणा के रूप में उनका पुत्र खोजकर लौटाया था | कर्ण ने परशुराम को गुरु बनाया था |


जानिए शास्त्रों में बताए गए कुछ खास गुरुओं के बारे में ...


श्रीकृष्ण ने गुरु सांदीपनि को गुरु दक्षिणा में खोज कर लौटाया उनका पुत्र

भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के गुरु महर्षि सांदीपनि थे | सांदीपनि ने ही श्रीकृष्ण को 64 कलाओं की शिक्षा दी थी| मध्य प्रदेश के उज्जैन में गुरु सांदीपनि का आश्रम है | शिक्षा पूरी होने के बाद जब गुरु दक्षिणा की बात आई तो ऋषि सांदीपनि ने कहा कि शंखासुर नाम का एक दैत्य मेरे पुत्र को उठाकर ले गया है। उसे ले लाओ .. यही गुरु दक्षिणा होगी | श्रीकृष्ण ने गुरु पुत्र को खोजकर वापस लाने का वचन दे दिया |

श्रीकृष्ण और बलराम समुद्र तक पहुंचे तो समुद्र ने बताया कि पंचज जाति का दैत्य शंख के रूप में समुद्र में छिपा है | संभव है कि उसी ने आपके गुरु के पुत्र को खाया हो | भगवान श्रीकृष्ण शंखासुर को मारकर उसके पेट में गुरु पुत्र को खोजा लेकिन वह नहीं मिला तब श्रीकृष्ण शंखासुर के शरीर का शंख लेकर यमलोक पहुंच गए यमराज से गुरु पुत्र को वापस लेकर गुरु सांदीपनि को लौटा दिया |


परशुराम ने कर्ण को दिया था शाप

परशुराम अष्ट चिरंजीवियों में से हैं , परशुराम को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है | इन्होंने शिवजी से अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त की , महाभारत काल में भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण इनके शिष्य थे | कर्ण ने परशुराम को धोखा देकर शिक्षा प्राप्त की थी | जब परशुराम को ये बात मालूम हुई तो उन्होंने क्रोधित होकर कर्ण को शाप दिया कि जब मेरी सिखाई हुई शस्त्र विद्या की जब तुम्हें सबसे अधिक आवश्यकता होगी उस समय तुम ये विद्या भूल जाओगे | इसके बाद अर्जुन से युद्ध के समय कर्ण शाप वजह से शस्त्र विद्या भूल गया था इस वजह से ही कर्ण की मृत्यु हुई|



 महर्षि वेदव्यास ने गांधारी को दिया था सौ पुत्र होने का वरदान 

महर्षि वेदव्यास का पूरा नाम कृष्णद्वैपायन था | इन्होंने ही वेदों का विभाग किया, इसलिए इनका नाम वेदव्यास पड़ा | सभी पुराणों की रचना की | महाभारत की रचना की |

महाभारत काल में महर्षि वेदव्यास ने गांधारी सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान दिया था | कुछ समय बाद गांधारी के गर्भ से मांस का एक गोल पिंड निकला | गांधारी उसे नष्ट करना चाहती थी | जब ये बात वेदव्यास जी को मालूम हुई तो उन्होंने 100 कुंडों का निर्माण करवाया और उनमें घी भरवा दिया | इसके बाद महर्षि वेदव्यास ने उस पिंड के 100 टुकड़े करके सभी कुंडों में डाल दिया | कुछ समय बाद उन कुंडों से गांधारी के 100 पुत्र उत्पन्न हुए |


 देवताओं के गुरु है बृहस्पति, राजा नहुष का घमंड किया था दूर

देवताओं के गुरु बृहस्पति है | महाभारत के आदि पर्व के अनुसार, बृहस्पति महर्षि अंगिरा के पुत्र है एक बार देवराज इंद्र स्वर्ग छोड़ कर चले गए | उनके स्थान पर राजा नहुष को स्वर्ग का राजा बनाया गया | राजा बनते ही नहुष के मन में पाप आ गया | वह अहंकारी हो गया था उसने इंद्र की पत्नी शचि पर भी अधिकार करना चाहा |

शचि ने ये बात बृहस्पति को बताई | बृहस्पति ने शचि से कहा कि आप नहुष से कहना कि जब वह सप्त ऋषियों द्वारा उठाई गई पालकी में बैठकर आएगा तभी तुम उसे अपना स्वामी मानोगी ये बात शचि ने नहुष से कही तो नहुष ने भी ऐसा ही किया जब सप्तऋषि पालकी उठाकर चल रहे थे तभी नहुष ने एक ऋषि को लात मार दी, क्रोधित होकर अगस्त्य मुनि ने उसे स्वर्ग से गिरने का शाप दे दिया | इस प्रकार देवगुरु बृहस्पति ने नहुष का घमंड तोड़ा और शचि की रक्षा की |



असुरों के गुरु शुक्राचार्य की नही है एक आंख

शुक्राचार्य दैत्यों के गुरु है | ये भृगु ऋषि तथा हिरण्यकशिपु की पुत्री दिव्या के पुत्र है | शिवजी ने इन्हें मृत संजीवन विद्या का सिखाई थी | इसके बल पर शुक्राचार्य मृत दैत्यों को जीवित कर देते थे | वामन अवतार के समय जब राजा बलि ने ब्राह्मण को तीन पग भूमि दान करने का वचन दिया था | तब शुक्राचार्य सूक्ष्म रूप में बलि के कमंडल में जाकर बैठ गए जिससे की पानी बाहर न आए और बलि भूमि दान का संकल्प न ले सके तब वामन भगवान ने बलि के कमंडल में एक तिनका डाला जिससे शुक्राचार्य की एक आंख फूट गई |


 वशिष्ठ ऋषि और विश्वामित्र का प्रसंग

ऋषि वशिष्ठ श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के कुल गुरु थे | एक बार राजा विश्वामित्र शिकार करते हुए ऋषि वशिष्ठ के आश्रम में पहुंच गए | यहां उन्होंने कामधेनु नंदिनी को देखा विश्वामित्र ने वशिष्ठ से कहा ये गाय आप मुझे दे दें | वशिष्ठ ने ऐसा करने से मना कर दिया तो राजा विश्वामित्र नंदिनी को बलपूर्वक ले जाने लगे तब नंदिनी गाय ने विश्वामित्र सहित उनकी पूरी सेना को भगा दिया ऋषि वशिष्ठ का ब्रह्म तेज देखकर विश्वामित्र हैरान थे | इसके बाद उन्होंने राजपाठ छोड़कर तपस्या शुरू कर दी |


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गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

हैरान हो जाएंगे.... सती सुलोचना की इस रोचक कहानी को पढ़कर...

सती सुलोचना की कथा


 सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ। उसके कटे हुए शीश को भगवान श्रीराम के शिविर में लाया गया था।


अपने पती की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जाकर पति का शीश लाने की प्रार्थना की। किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने सुलोचना से कहा कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये। क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसीलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए।


रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं- "लक्ष्मण, रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदह नहीं है।


परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एकनारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है।


ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सैना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये।


मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुई उसकी पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। पर उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया। उसने सोचा, सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यकित की हो।


ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा- "यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृत्तांत लिख दे। भुजा में दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया- "प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है।


युद्ध भूमि में श्रीराम के भाई लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कई वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वे तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।


पति की भुजा-लिखित पंकितयां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावणने आकर कहा- 'शोक न कर पुत्री। 


प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा। करुण चीत्कार करती हुई सुलोचना बोली- "पर इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी। सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के आभाव की पूर्ती नहीं कर सकेंगे। सुलोचना ने निश्चय किया कि 'मुझे अब सती हो जाना चाहिए।'


 किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- "देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। 


जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।"


सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले- "देवी, तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे; किंतु विधी की लिखी को कौन बदल सकता है। आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है। सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी। 


श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा- "देवी, मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतित्व से तो विश्व भी थर्राता है। अपने स्वयं यहाँ आने का कारण बताओ, बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ? 


सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली- "राघवेन्द्र, मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आई हूँ। श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया।


पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा- "सुमित्रानन्दन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना की मेघनाथ का वध मैंने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी। 


यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ती रखने वाली उनकी अनन्य उपसिका हूँ। पर मेरे पति देव पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।


सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है। 


जिज्ञासा शान्त करने के लिये सुग्रीव ने पूछ ही लिया कि यह बात उन्हें कैसे ज्ञात हुई कि मेघनाद का शीश श्रीराम के शिविर में है। सुलोचना ने स्पष्टता से बता दिया- "मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुई मेरे पास चली गयी थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया। 


व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे- "निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है। श्रीराम ने कहा- "व्यर्थ बातें मन करो मित्र। पतिव्रता के महाम्तय को तुम नहीं जानते। यदि वह चाहे तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।


श्रीराम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी। उसने कहा- "यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा। 


यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- "भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ। 


अत: आज युद्ध बंद रहे। श्रीराम ने सुलोचना की प्रार्थना स्वीकार कर ली। सुलोचना पति का सिर लेकर वापस लंका आ गई। लंका में समुद्र के तट पर एक चंदन की चिता तैयार की गयी। पति का शीश गोद में लेकर सुलोचना चिता पर बैठी और धधकती हुई अग्नि में कुछ ही क्षणों में सती हो गई।


सोमवार, 8 अप्रैल 2024

जानिए माता के नव रूपों के बारे मे साथ ही उनके प्रिय मंत्र, प्रिय फूल, प्रिय फल, और प्रिय भोग....

 

जय माता दी 


मां दुर्गा के 9 अवतार



 इन दिनों शक्ति के नौ रूपों की पूजा की जाती है|  नौ देवियां निम्नलिखित है-



देवी दुर्गा के नौ रूपों का वर्णन

शैलपुत्री

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्‌।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

१ शैलपुत्री – नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के पहले रूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है जिन्हें चंद्रमा का प्रतीक माना गया है|  शैलपुत्री की पूजा करने से सभी प्रकार के चन्द्रमा के बुरे प्रभाव समाप्त हो जाते है और जीवन में शांति आती है |  इस दिन भक्तों को पीले रंग के वस्त्र पहनने चाहिए।

 प्रिय फूल - कनेर के पुष्प 

प्रिय फल - अनार 

भोग - घी का भोग 




                         ब्रह्मचारिणी

दधाना करपद्माभ्यामक्षमाला-कमण्डलू ।

देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

२ ब्रह्मचारिणी – ब्रह्मचारिणी को मां दुर्गा का दूसरा रूप कहां गया है | मां ब्रह्मचारिणी की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन पूरे विधान से की जाती है | मां ब्रह्मचारिणी मंगल ग्रह को प्रदर्शित करती हैं ,जो इस दिन पूरे मन से पूजा करता है उसके समस्त प्रकार के दुख दर्द और तकलीफ दूर हो जाती है | इस दिन आपको हरे रंग के कपड़े पहनने चाहिए।

 प्रिय फूल -वट यानी कि बरगद के पेड़ का फूल 

प्रिय फल - सेब 

भोग - मां ब्रह्मचारिणी को चीनी और मिश्री काफी पसंद हें | 



                           चंद्रघंटा

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

३ चंद्रघंटा – नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है जो कि शुक्र  ग्रह को नियंत्रित करती हैं मां चंद्रघंटा की पूजा करने से सभी प्रकार के भय दूर हो जाते हैं इस दिन ग्रे रंग के कपड़े पहनने की मान्यता है।

 प्रिय फूल - शंखपुष्पी के फूल

प्रिय फल - केला 

भोग - दूध या दूध से बनी मिठाई खीर का भोग






                       कूष्माण्डा

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदाऽस्तु मे॥

४ कूष्माण्डा
 – नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा बड़ी धूमधाम से की जाती है जो कि गुरु को प्रदर्शित करती है इस दिन नारंगी रंग के वस्त्र पहनने को शुभ माना जाता है मां कुष्मांडा सभी प्रकार की विपत्तियों को दूर कर देती है।

  प्रिय फूल - लाल वस्त्र, लाल रंग के फूल
  प्रिय फल - नाशपाती 
भोग -  पंचफल और मालपुए

                                       


स्कंदमाता

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।

शुभदाऽस्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी

५ स्कंदमाता – नवरात्रि के पांचवे दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है जो कि बुध ग्रह को नियंत्रित करती है अगर आप पूरे विधि विधान से मां की पूजा करते हैं तो आप मां की कृपा सदैव बनी रहती है मान्यता है इससे संतान सुख प्राप्त होता है साथ ही इस दिन सफेद कपड़ो को पहनने का विधान है।

 प्रिय फूल - पीले रंग का फूल पसंद है

प्रिय फल - अंगूर 

भोग - केले का भोग 



कात्यायनी


चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानव-घातिनी॥

६ कात्यायनी – बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करने वाली मां कात्यायनी की पूजा नवरात्रि के छठवें दिन अर्थात षष्ठी तिथि को की जाती हैं मां की पूजा करने से हिम्मत और शक्ति में वृद्धि होती है इस दिन आपको लाल रंग के कपड़े पहनने चाहिए।

प्रिय फूल -  बेर के पेड़ के फूल

प्रिय फल - अमरुद 

भोग -  शहद अर्पित करना चाहिए



कालरात्रि

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।

वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

७ कालरात्रि – सप्तमी तिथि को माता कालरात्रि की पूजा की जाती है जिन्हें शनि ग्रह का प्रतीक माना गया है मां कालरात्रि की पूजा करने से भक्तों में वीरता बढ़ जाती हैं  साथ ही आपको इस दिन नीले रंग के कपड़े पहनने  चाहिए।

प्रिय फूल - रात रानी का फूल या फिर गेंदा अर्पित करें

प्रिय फल - चीकू 

भोग - गुड़ का प्रसाद 




महागौरी

श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।

महागौरी शुभं दद्यान्महादेव-प्रमोद-दा॥


८ महागौरी – नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है जिन्हें राहु ग्रह को नियंत्रित करने के प्रति के रूप में माना गया है इस दिन पूजा करने से समस्त प्रकार की नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती है इस दिन आपको गुलाबी रंग के कपड़े पहनने चाहिए।

 प्रिय फूल - मोगरे के फूल

प्रिय फल - शरीफा 

भोग - नारियल या नारियल से बनी चीजें 



                        सिद्धिदात्री

सिद्धगन्धर्व-यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।

सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

९ सिद्धिदात्री – नवरात्रि के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है केतु ग्रह को नियंत्रित करती हैं इस दिन आपको पर्पल रंग के कपड़े पहनने चाहिए जिससे आपकी बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है।

 प्रिय फूल - चंपा या गुड़हल के फूल

प्रिय फल - संतरा  

भोग - प्रिय भोग हलवा, पूड़ी ,चने और नारियल




नवरात्रि पूजा विधि 


सुबह जल्दी उठे तथा स्नान करने के बाद स्वच्छ कपड़े पहन ले

उसके उपरांत उपयुक्त दी गई पूजा सामग्री को इकट्ठा कर ले

उसके उपरांत पूजा की थाली सजाएं

इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर लाएं और लाल रंग के वस्त्र में रख दे

आपको मिट्टी के बर्तन में जौ के बीज बोने चाहिए तथा नवरात्रि के अंतिम दिन यानी 9 मई तक आपको उसमें प्रतिदिन पानी का छिड़काव करना चाहिए

शुभ मुहूर्त के अनुसार क्लास को स्थापित करें इसमें गंगाजल को भरने साथ ही कलर्स के मुख पर आम की प्रतियां लगाएं तथा नारियल को उसके ऊपर रख लें अब लाल कपड़े से कलश को लपेट लें अब इसको मिट्टी के बर्तन के पास रख दें

अब उपयुक्त पूजा विधि के द्वारा पूजा आरंभ करें मां दुर्गा का नाम ले मां दुर्गा की आरती और चालीसा गायें और जिस दिन आप पूजा कर रहे हैं उस दिन मां दुर्गा के उस रूप का नाम लें तथा मंत्रोच्चारण करें

सभी 9 दिनों तक सभी शक्ति रूपों से संबंधित मंत्र का जाप करें तथा शक्ति रूपा की पूजा करके उनसे समृद्धि की कामना करें

मान्यताओं के अनुसार अष्टमी या नवमी तिथि के दिन आपको दुर्गा पूजा करने के बाद नौ कन्याओं का पूजन करना चाहिए साथ ही साथ उन्हें भोजन खिलाकर दान दक्षिणा दे

नवरात्रि के अंतिम दिन दुर्गा माता का विसर्जन करें आरती गाएं उनकी चालीसा गाने तथा फूल चावल को चढ़ाकर विधि से कलश को उठा लें

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।

तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।

पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।

उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।


माँ दुर्गा के नौ रूप के विषय में विस्तार से जानिए
माँ दुर्गा के सभी नौ रूपों का अलग अलग महत्व
माँ दुर्गा के 9 रूपों का वर्णन |
मां दुर्गा के 9 अवतार
माता के नौ रूपों का पुराणों में वर्णन मिलता है।
माता के नौ रूप दरअसल है क्या ?

 जानिए माता के नव रूपों के बारे मे साथ ही उनके प्रिय मंत्र, प्रिय फूल, प्रिय फल, और भोग.... 


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शनिवार, 6 अप्रैल 2024

चैत्र नवरात्रि


 कब से शुरू हो हो रही हैं चैत्र नवरात्रि?


चैत्र नवरात्रि की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। चैत्र नवरात्रि के 9 दिनों तक घरों एवं मंदिरों में शक्ति की देवी दुर्गा की विशेष पूजा की जाती है। हिन्दू वैदिक पंचांग के अनुसार, इसी दिन से हिंदू नववर्ष भी शुरू होता है। इसी कारण से यह वासंतिक नवरात्रि बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

 

हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के समय में पूरे विधि-विधान के साथ देवी के नौ रूपों की पूजा करने से व्यक्ति को शुभ फल की प्राप्ति होती है। इस बार, चैत्र नवरात्रि, 09 अप्रैल 2024 से शुरू हो रही हैं, क्योंकि प्रतिपदा तिथि 08 मार्च की रात से लग रही है। इसलिए, उदया तिथि के कारण नवरात्रि 09 अप्रैल से शुरू होंगी और 17 अप्रैल 2024 को राम नवमी मनाई जाएगी।


इस बार क्या है माता की सवारी? 

हिन्दू शास्त्रज्ञों के अनुसार, इस बार माता रानी घोड़े पर सवार होकर आएंगी। अगर नवरात्रि की शुरुआत मंगलवार से हो तो माना जाता है कि मां घोड़े पर सवार होकर आती हैं, जिसे शुभ नहीं माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इससे राष्ट्र में प्राकृतिक आपदा होने की संभावना बढ़ सकती है।


कलश स्थापना मुहूर्त 

इस बार नवरात्रि पर कलश स्थापना के लिए सिर्फ 50 मिनट का समय है। कलश स्थापना 09 अप्रैल को सुबह 06 बजकर 12 मिनट से सुबह 10 बजकर 23 मिनट तक कर सकते हैं। यह सामान्य मुहूर्त है, जिसकी कुल अवधि 04 घंटे 11 मिनट की है। घटस्थापना, अभिजीत मुहूर्त में दोपहर 12 बजकर 3 मिनट से 12 बजकर 53 मिनट तक है, जिसकी कुल अवधि केवल 50 मिनट की ही है। 


कलश स्थापना सामग्री

हिंदू धर्म के अंदर नवरात्रि में कलश स्थापना करना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। कलश स्थापना के लिए सात तरह का अनाज, मिट्टी का बर्तन, पवित्र स्थान से लायी गयी मिट्टी, कलश, गंगाजल, आम या अशोक के पत्ते, सुपारी, जटा वाला नारियल, लाल सूत्र, मौली, इलायची, लौंग, कपूर, रोली, अक्षत, लाल कपड़ा और फूलों की सामग्री की आवश्यकता होती है ।


हवन सामग्री

नवरात्रि में हवन सामग्री के लिए पीपल का तना और छाल, बेल, नीम, पलाश, चंदन की लकड़ी, अश्वगंधा, ब्राह्मी, मुलैठी की जड़, तिल, चावल, लौंग, गूलर की छाल, गाय का घी, गुग्गल, लोभान, इलायची, शक्कर, जौ, सूखा नारियल, कलावा और लाल रंग का कपड़ा होना आवश्यक है।


मां दुर्गा की कृपा पाने का प्रयास हर भक्त पूरी निष्ठा के साथ करता है। माना जाता है कि अगर पूरे विधि-विधान के साथ मां दुर्गा की पूजा की जाए तो भक्तों के घर में सुख-शांति का वास होता है और साथ ही मां दुर्गा की कृपा सदैव उन पर बनी रहती है।


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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

प्रह्लाद और होलिका दहन की कहानी

 

प्रह्लाद और होलिका दहन की कहानी


बात उन दिनों की है जब धरती पर दैत्य हिरण्यकशिपु (जिसे हिरण्यकश्यप भी कहा जाता है) का अत्याचार बढ़ता जा रहा था| ऋषि-मुनि, देवी-देवता और सभी भक्त अपनी रक्षा के लिए ईश्वर से गुहार कर रहे थे। धरती पर पाप बढ़ रहा था और सकारात्मकता, ईश्वर भक्ति और सदाचार का नाश हो रहा था। वैसे तो हिरण्यकशिपु एक दैत्य था पर इस दैत्य की पत्नी कयाधु ने गर्भावस्था के दौरान एक ऋषि के आश्रम में निवास किया था जिसकी पवित्रता से कयाधु का पुत्र एक सदाचारी, सत्कर्म करने वाला और ईश्वर भक्त बालक के रूप में जन्मा और उस बालक का नाम रखा गया प्रह्लाद। अच्छी संगति और ज्ञान के कारण प्रह्लाद में भी ईश्वर भक्ति व सदाचार की भावनाएं उत्पन्न हुईं और उम्र के साथ भगवान विष्णु के प्रति उसकी भक्ति भी बढ़ने लगी। लेकिन ईश्वर के प्रति ऐसी निष्ठा व आस्था को देख कर प्रह्लाद का पिता दैत्यराज हिरण्यकशिपु क्रोधित हो जाता था। उसने प्रह्लाद को विष्णु भक्ति के मार्ग से हटाने के लिए अनेक प्रयास किए पर वह हर बार विफल ही हुआ। 


कई प्रयासों में विफल होने के बाद हिरण्यकशिपु ने अपने ही पुत्र को मृत्यु दंड देने का निर्णय लिया। इसी उद्देश्य से उसने अपनी बहन को बुलाया जिसका नाम ‘होलिका’ था और उसे आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को लेकर जलती हुई चिता पर बैठ जाए। ऐसा कहा जाता है कि होलिका को कभी भी आग से न जलने का वरदान मिला था और इसलिए उसने दैत्यराज का आदेश स्वीकार कर लिया। हिरण्यकशिपु की योजना यही थी कि जब होलिका प्रह्लाद को लेकर जलती हुई चिता पर बैठ जाएगी तो प्रह्लाद उस अग्नि में जलकर नष्ट हो जाएगा व साथ ही उसके साथ विष्णु भगवान की भक्ति भी खत्म हो जाएगी। पर सही कहा गया है कि जिस पर ईश्वर की कृपा है, जो भक्ति के मार्ग पर अग्रसर है व धर्मपरायण है उसका विनाश कोई भी नहीं कर सकता है। इसी विश्वास के साथ प्रह्लाद ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः’ मंत्र का जाप करते हुए होलिका के साथ जलती हुई चिता में बैठ गया। 


एक तरफ हिरण्यकशिपु इस बात से मन ही मन खुश हो रहा था कि अब भगवान विष्णु की भक्ति व उनके भक्त दोनों का विनाश हो जाएगा और वहीं दूसरी तरफ प्रह्लाद के मन में ईश्वर भक्ति व अगाध श्रद्धा थी जिसकी वजह से आग की तेज लपटों में जलकर खुद होलिका ही भस्म हो गई परंतु प्रह्लाद को कोई भी हानि नहीं हुई और वह उस आग से भी बचकर बाहर आ गया। ईश्वर की असीम कृपा व प्रह्लाद की सच्ची निष्ठा व भक्ति ने इस चमत्कार को साकार किया था। ऐसा माना जाता है कि तब से ही होलिका दहन की प्रथा शुरू हुई और बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाने लगा। 


इस कहानी से हमें पता लगता है कि होली और होलिका दहन का महत्व क्या है और धुलेंडी यानी रंग खेलकर होली मनाने के एक दिन पहले होलिका दहन क्यों किया जाता है|

प्रह्लाद और होलिका दहन की कहानी पौराणिक कहानियों के अंतर्गत आती है।


प्रह्लाद और होलिका दहन की कहानी से सीख (Moral of Prahalad And Holika Dahan Hindi Story)

प्रह्लाद और होलिका दहन की कहानी से यह सीख मिलती है कि धर्म, ईश्वर भक्ति व सदाचार के आगे कोई भी बुराई ज्यादा देर तक नहीं टिक पाती है। इसलिए हमें हमेशा सदाचार व सद्बुद्धि का अनुसरण करना चाहिए और ईश्वर पर विश्वास रखना चाहिए।


1. होलिका कौन थी?

होलिका एक राक्षसी थी जो हिरण्यकश्यप की बहन और प्रहलाद की बुआ थी।


2. प्रह्लाद किसका भक्त था?

प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था।


3. होलिका प्रह्लाद की कौन थी?

होलिका प्रह्लाद की बुआ थी।


4. होलिका दहन किस तिथि को किया जाता है?

होलिका दहन फाल्गुन मास की पूर्णिमा को किया जाता है।


 होलिका दहन की सुप्रसिद्ध कहानी प्रह्लाद नामक एक बच्चे की है जो भगवान विष्णु का सच्चा भक्त था और उसकी सच्ची निष्ठा के कारण ही भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लिया था।


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गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

जानिए आखिर कैसे? गीता जी के एक फटे हुए पन्ने ने चुड़ैल से बचाई जान.......

गीताजी का प्रभाव



एक सिपाही था। उसका तबादला नजदीक के एक गाँव में हुआ और वह वहाँ एक कमरा किराये पर लेकर रहने लगा।


एक बार रात के समय वह अपने कमरे में आ रहा था। रास्ते में चंद्रमा की चाँदनी में उसने एक सुंदर नवयुवती को एक पेड़ के नीचे उदास बैठे हुए देखा।


सिपाही ने जब उससे बातचीत की, तब उसने बताया कि उसके पति से उसका झगड़ा हो गया है।उसका यहाँ अपना कोई नहीं है, इसलिए वह अकेली बैठी है।


उस युवती के पूछने पर कि क्या वह उसके साथ आ सकती है..??  सिपाही उसे नहीं जानता था, फिर भी कह दिया - हाँ ! आ जाओ। तब वह युवती उसके पीछे-पीछे उसके कमरे में आ गई।


इस तरह वह युवती रोज रात में सिपाही के पास आती, उसका संग करती और सवेरा होने के पहले ही चली जाती थी।


इस तरह वह युवती सिपाही का शारीरिक शोषण करती थी, उसका खून चूसती और उसकी शक्ति क्षीण करने लगी थी।


एक रात को एक घटना हुई कि वे दोनों सो रहे थे और लालटेन जलती रह गई थी। सिपाही ने उस युवती से कहा कि जरा लालटेन तो बुझा दो। लेेटे-लेटे ही उस युवती ने अपना एक हाथ लंबा किया और लालटेन को बुझा दिया।


सिपाही ने ज्यों ही उसके लंबे होते हुए हाथ को देखा तो उसके पसीना छूट गया और वह घबरा कर डर के मारे उठ कर बैठ गया।


सिपाही के बहुत पूछने पर उस युवती ने बताया कि वह साधारण स्त्री नहीं है.. बल्कि एक 'चुड़ैल' है। 


साथ ही उसने उसे यह भी धमकी दी कि यदि यह बात किसी को बता दी तो वह उसे जिन्दा नहीं छोड़ेगी और मार डालेगी, क्योंकि उसने 'आ जा..' ऐसा कह कर उसे अपना लिया था।


सिपाही का शरीर दिन-ब-दिन सूखने लगा। उसके साथ वालों ने उससे बहुत ही पूछा कि तुम्हारा यह हाल क्यों हो रहा है, लेकिन डर के मारे वह किसी को भी कुछ भी बताता नहीं था।


एक दिन वह किसी वैद्यजी के पास गया। वैद्यजी ने सिपाही को कुछ दवा एक कागज के पुड़िया में बाँध कर दे दी, जिसे उसने अपनी जेब में रख लिया।


रोज की तरह ही रात्रि को वह चुड़ैल आई और कमरे के बाहर से ही बोलने लगी कि सिपाहीजी ! तुम्हारी जेब में जो कागज की पुड़िया है, उसे बाहर फेंक दो, तब मैं अंदर आऊँगी।


पुड़िया को फेंक देने की बात बार-बार कहने पर सिपाही को यह विश्वास हो गया कि पुड़िया में जरूर कोई करामात है, तभी तो यह चुड़ैल मेरे पास नहीं आ रही है। उसने वह पुड़िया नहीं फेंका।


चुड़ैल हार-थक कर वापस चली गई। सिपाही ने जेब से पुड़िया निकाला तो देखा कि वह कागज 'गीता' का फटा हुआ एक पन्ना था।


सिपाही को बात समझते देर नहीं लगी कि यह तो गीताजी का ही प्रभाव है कि वह चुड़ैल डर के मारे भाग गई।


अब वह हमेशा अपनी जेब में गीताजी रखता था और निर्भय होकर, स्वस्थ होकर, स्वछन्द विचरण करता था।


रोजाना गीता पाठ के लाभ

जो व्यक्ति नियमित रूप से भगवत गीता का पाठ करता है उसका मन हमेशा शांत रहता है। वितरित परिस्थियों में भी वह अपने मन पर काबू पाने की क्षमता रखता है। वह जैसे चाहे अपने मन को कार्य में ले सकता है।


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Impotant

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