गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

रोज सुबह ये 1 काम करने से जीवन में शांति और सफलता आती है (धार्मिक मान्यता)

 

🌅 सुबह का समय क्यों होता है खास?

सुबह का समय हमारे जीवन का सबसे पवित्र और शांत समय माना जाता है। इस समय किया गया कोई भी कार्य हमारे पूरे दिन पर असर डालता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सुबह उठकर किया गया एक छोटा सा उपाय भी जीवन में बड़ा बदलाव ला सकता है।


🧘 क्या है वो 1 काम?

सुबह उठते ही सबसे पहले भगवान का स्मरण करें और अपने दोनों हाथों को देखकर यह मंत्र बोलें:

“कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती।
करमूले तु गोविन्दः, प्रभाते करदर्शनम्॥”


🙏 इस उपाय का महत्व

ऐसी मान्यता है कि:

  • इससे दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा से होती है
  • मन शांत और स्थिर रहता है
  • कार्यों में सफलता मिलने की संभावना बढ़ती है

🌿 करने का सही तरीका

  1. सुबह उठते ही बिस्तर पर बैठ जाएं
  2. अपने दोनों हाथों को देखें
  3. ऊपर दिया गया मंत्र 1 बार बोलें
  4. फिर धरती माता को स्पर्श करें

⚠️ ध्यान रखने वाली बातें

  • यह एक धार्मिक मान्यता है
  • इसका प्रभाव व्यक्ति की श्रद्धा और विश्वास पर निर्भर करता है
  • इसे नियमित रूप से करना जरूरी है

✨ निष्कर्ष

यह छोटा सा उपाय आपके जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
नियमित रूप से करने पर मानसिक शांति और आत्मविश्वास बढ़ता है।


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सोमवार, 20 अप्रैल 2026

भगवान कहाँ रहते हैं...?


भगवान कहाँ रहते हैं...?


          एक ब्राह्मण था, वह घरों पर जाकर पूजा पाठ कर अपना जीवन यापन किया करता था। एक बार उस ब्राह्मण को नगर के राजा के महल से पूजा के लिये बुलावा आया। वह ब्राह्मण राजमहल का बुलावा पाकर खुशी-खुशी पूजा करने गया। पूजा सम्पन्न कराकर जब ब्राह्मण घर को आने लगा, तब राजा ने ब्राह्मण से एक सवाल किया, "हे ब्राह्मण देव ! आप भगवान की पूजा करते हैं तो यह बताये की भगवान कहाँ रहते हैं ? उनकी नजर किस ओर है, और भगवान क्या कर सकते हैं ?"

          राजा के प्रश्न सुन ब्राह्मण अचंभित हो गया और कुछ समय विचार करने के बाद राजा से कहा, "हे राजन ! इस सवाल के जवाब के लिए मुझे समय दीजिए।" 

          राजा ने ब्राह्मण को एक माह का समय दिया। ब्राह्मण प्रतिदिन इसी सोच में उलझा रहता कि इसका जवाब क्या होगा। ऐसा करते-करते समय बीतता गया और कुछ ही दिन शेष रह गये। समय बीतने के साथ ब्राह्मण की चिंता भी बढ़ने लगी और जवाब नही मिलने के कारण ब्राह्मण उदास रहने लगा।

          एक दिन ब्राह्मण को चिंतित देख ब्राह्मण के पुत्र ने कहा पिता जी आप इतने उदास क्यों हैं। तब ब्राह्मण ने कहा, "बेटा ! कुछ दिनों पहले में पूजा कराने राजमहल गया हुआ था, पूजा सम्पन्न कराकर जब मैं वापस आ रहा था तब राजा ने मुझसे एक सवाल पूछा था।  राजा ने कहा था कि भगवान कहाँ रहते हैं ?  भगवान क्या कर सकते हैं और भगवान की नजर किस ओर है। राजा के सवाल का जवाब मुझे उस समय नही सुझा तो मैने उनसे कुछ समय मांगा था, जिसके जवाब के लिये राजा ने मुझे एक माह की समय दिया था और वह एक माह बीतने वाला है लेकिन इसका जवाब मेरे पास नही है, इसलिए मैं चिंतित हूँ।" ब्राह्मण की बात सुनकर उनका पुत्र बोला, "पिताजी ! इसका जवाब मैं राजा को दूँगा। आप मुझे साथ ले चलिये।"

          एक माह पूरा हुआ तब ब्राह्मण अपने पुत्र को लेकर राजमहल गया और राजा से कहा, "हे राजन ! आपके सवाल का जवाब मेरा पुत्र देगा।" राजा ने ब्राह्मण के पुत्र से वही सवाल पूछा बताओ भगवान कहाँ रहते हैं, भगवान की नजर किस ओर है तथा भगवान क्या कर सकते हैं ? 

          उस ब्राह्मण पुत्र ने राजा से कहा, "हे राजन ! क्या आपके राज्य मे पहले अतिथि का आदर सम्मान नही किया जाता।"  यह सुन राजा को थोड़ा लज्जित महसूस हुआ।  पहले उस बालक को आदर सत्कार के साथ स्थान दिया गया फिर पीने हेतु सेवक दूध का गिलास लाया गया। वह बालक दूध के गिलास पकड़कर दूध में अंगुली डालकर घुमाकर बार-बार दूध को बाहर निकालकर देखने लगा। यह देख राजा ने पूछा, "ये क्या कर रहे हो ?" 

          बालक ने कहा, "सुना है दूध में मक्खन होता है। मैं वही देख रहा हूँ कि दूध में मक्खन कहाँ है ? आपके राज्य के दूध से तो मक्खन ही गायब है।"

          राजा ने कहा, "दूध में मक्खन होता है, परन्तु वह ऐसे दिखाई नहीं देता। जब दूध को जमाकर दही बनाया जाता है, और फिर दही को मथा जाता हैं तब जाकर मक्खन प्राप्त होता है।"

          ब्राह्मण के पुत्र ने कहा, "महाराज ! यह आपके पहले सवाल का जवाब है। जिस तरह दूध से दही और फिर दही को मथने से मक्खन प्राप्त होता है, उसी प्रकार परमात्मा प्रत्येक जीव के अन्दर विद्यमान होते है। परन्तु उन्हें पाने के लिये सच्ची भक्ति की आवश्यकता होती है। मन से ध्यानपूर्वक भक्ति करने पर आत्मा में छुपे हुए परमात्मा का आभास होता है।" 

          राजा ब्राह्मण के पुत्र के जवाब से खुश हुआ और कहा अब मेरे दूसरे सवाल का जवाब दो, भगवान किस ओर देखते हैं ? उस बालक ने कहा, "राजन ! इसका जवाब मैं दूँगा परन्तु मुझे इसके लिये एक मोमबत्ती की आवश्यकता है।" राजा ने तुरन्त मोमबत्ती मंगाई और उस बालक को दिया। 

          उस बालक ने मोमबत्ती को जलाकर कहा, "राजन ! आप बताये, इस मोमबत्ती की रोशनी किस ओर है ?" राजा ने कहा, "इसकी रोशनी चारों दिशा में एक समान है।" तब उस बालक ने कहा, "हे राजन ! यही आपके दूसरे सवाल का जवाब है। क्योंकि परमात्मा सर्वदृष्टा हैं और उनकी नजर सभी प्राणियों के कर्मों की ओर परस्पर रहती है।" राजा उस बालक को जवाब से अत्यधिक प्रसन्न हो गये। अब तो वे अन्तिम प्रश्न के उत्तर दे लिये और भी उत्सुक हो उठे। 

          राजा ने कहा, "मेरे अन्तिम सवाल का जवाब दो कि भगवान क्या कर सकते हैं ?" बालक ने कहा, 'हे राजन ! मैं इस सवाल का उत्तर अवश्य दूँगा परन्तु इसके लिये मुझे आपकी जगह पर और आपको मेरी जगह पर आना होगा।" 

          राजा को तो उत्तर जाने की उत्सुकता थी वो अपनी सहमति दे दिये। वह बालक राजा के सिहासन पर जा बैठा और कहा, "राजन ! आपके अन्तिम सवाल का जवाब यह है, आपने कहा था कि भगवान क्या कर सकते हैं तो भगवान यह कर सकते कि मुझ जैसे रंक को राज सिहासन पर बैठा सकते हैं और आप जैसे राजा को मुझ जैसे सवाली के स्थान पर, अर्थात राजा को रंक और रंक को राजा बना  सकते हैं यह आपके अन्तिम सवाल का जवाब है।" 

          राजा उस ब्राह्मण पुत्र के जवाब से अत्यधिक प्रसन्न हुए और उसे अपना सलाहकार बना लिया। भगवान हर एक जीव के ह्रदय में निवास करते हैं। परमात्मा के साथ प्रेम करेंगे तो वह आपको सही मार्ग दिखाएंगे। इसलिए हर जीव को पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन करना चाहिए। जिससे आप अपने अन्दर की उस शक्ति से जुड़ सकें जो आपके भीतर ही मौजूद है लेकिन आप उसे पहचान नहीं पा रहे।

                      

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

क्या होता है होलाष्टक ? होलाष्टक मे क्या करें क्या न करें ? होलाष्टक के वैज्ञानिक तर्क



होलाष्टक



 होलाष्टक फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से शुरू होने वाले 8 दिनों की अवधि को कहते हैं,

जो Holi से पहले आती है। 

यह अवधि होलिका दहन से 8 दिन पहले शुरू होती है।

 इन 8 दिनों में शादी, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य शुभ नहीं माने जाते।



फाल्‍गुन मास की शुक्ला अष्‍टमी तिथि से लेकर पूर्णिमा तक के समय को होलाष्‍टक कहा जाता है। आमतौर पर होलाष्‍टक 8 दिनों का होता है, लेकिन कई बार 9 दिनों का हो सकता। इन आठ दिनों में किसी भी शुभ काम को करना पूरी तरह वर्जित माना जाता है।

 होलाष्टक अवधि में किसी भी शुभ काम जैसे नामकरण संस्कार, जनेऊ संस्कार, गृह प्रवेश, विवाह संस्कार आदि नहीं करना चाहिए।

1) कथा

पौराणिक मान्‍यता के अनुसार फाल्गुन शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि के दिन कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग कर दी थी। इसके कारण वे रुष्ट हो गए और उन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया था। इसके उपरांत कामदेव की पत्‍नी देवी रति ने शिवजी की आराधना की। इसके उपरांत आठ दिनों बाद शिवजी ने उनकी प्रार्थना सुनी और कामदेव को पुनर्जीवन का वरदान दिया।

2) कथा

भक्त प्रहलाद का जन्‍म राक्षस कुल में हुआ था, लेकिन वो भगवान विष्‍णु के अनन्‍य भक्‍त थे। उसके पिता हिरण्यकश्यप को ये बात बिल्‍कुल पसंद नहीं थी। इस कारण उसने फाल्‍गुन मास की अष्‍टमी तिथि से लेकर पूर्णिमा तक प्रहलाद को काफी यातनाएं दी थीं। जब उसकी यातनाओं का भी प्रह्लाद पर असर नहीं हुआ तो उसने पूर्णिमा के दिन अपनी बहन होलिका को प्रहलाद को लेकर अग्निमें बैठने को कहा।

होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्‍त था। जब होलिका उसे आग में लेकर बैठी तो भी प्रहलाद नहीं जला, लेकिन होलिका जलकर राख हो गई। इस कारण होली से पहले के आठ दिनों को अशुभ माना जाता है और पूर्णिमा के दिन होलिका को जलाया जाता है, जो कि बुराई पर अच्‍छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इसके उपरांत ही होली का पर्व मनाया जाता है।


होलाष्टक के 8 दिनों में क्या करें?

भगवान विष्णु की पूजा करें
हिंदू मान्यता के अनुसार इन आठ दिनों में भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा और मंत्र जप करना विशेष फलदायी होता है। जिस प्रकार भगवान विष्णु ने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी, उसी प्रकार श्रद्धा से पूजा करने पर वे भक्तों के कष्ट दूर करते हैं।

लक्ष्मी-नारायण साधना
यदि आर्थिक संकट चल रहा हो तो होलाष्टक के दौरान माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की संयुक्त पूजा करें। प्रतिदिन श्रीसूक्त और ऋण मोचन मंगल स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत शुभ माना गया है।

शिव साधना और महामृत्युंजय मंत्र
जो लोग रोग, शत्रु बाधा या मानसिक तनाव से परेशान हैं, वे इन दिनों भगवान शिव की आराधना करें। प्रतिदिन रुद्राष्टकम का पाठ और महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से संकट दूर होते हैं।

श्रीकृष्ण और नृसिंह मंत्र जप
होलाष्टक के दौरान भगवान श्रीकृष्ण या भगवान नृसिंह के मंत्रों का जप करना भी शुभ माना गया है। इन दिनों भगवान श्रीकृष्ण को अबीर-गुलाल अर्पित करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।


होलाष्टक के 8 दिनों में क्या न करें?

मांगलिक कार्यों से परहेज
इन आठ दिनों में विवाह, सगाई, तिलक, मुंडन, गृह प्रवेश, जनेऊ संस्कार आदि मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिए। मान्यता है कि इस अवधि में किए गए शुभ कार्यों में बाधाएं आती हैं।

बाल और नाखून न काटें
होलाष्टक के दौरान बाल या नाखून काटना अशुभ माना गया है। इससे दुर्भाग्य और बाधाएं बढ़ सकती हैं।

वाद-विवाद से बचें
इन दिनों ग्रहों की स्थिति उग्र मानी जाती है, इसलिए झगड़े और विवाद से दूरी बनाए रखें। नकारात्मक लोगों से दूर रहना बेहतर रहेगा।

तामसिक भोजन से परहेज
मांस, मदिरा और अन्य तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। सात्विक आहार और संयमित जीवनशैली अपनाना शुभ फलदायी होता है।


धार्मिक महत्व
होलाष्टक आत्मशुद्धि, तप, संयम और भक्ति का समय है। यह अवधि व्यक्ति को बाहरी उत्सव से पहले आंतरिक शुद्धि का संदेश देती है। इन आठ दिनों में की गई साधना कई गुना फल देती है।



होलाष्टक के वैज्ञानिक तर्क

होलाष्‍टक के समय को अशुभ बताने के पीछे बहुत सारे धार्मिक कारण दिए जाते रहे हों, लेकिन इसका मुख्‍य कारण आपकी सेहत से जुड़ा हुआ है। होली प्रारंभ से पहले वाले सप्‍ताह में मौसम में काफी बदलाव होना शुरू हो जाता है। इस बदलाव के बीच कभी सर्दी और कभी गर्मी का आना-जाना लगा रहता है। मौसम के इस बदलाव के कारण शरीर की इम्‍यूनिटी कमजोर पड़ जाती है। अतः व्यक्ति के रोगों की चपेट में आने की आशंका भी बढ़ जाती है।

किसी भी शुभ कार्य में काम का बोझ अत्यधिक बढ़ जाता है, अगर ऐसे में व्‍यक्ति किसी बीमारी की चपेट में आ गया तो वो उन कामों को ठीक से न करने की संभावना बढ़ जाएगी। इस कारण से मौसम बदलाव के इन आठ दिनों को अशुभ बताकर किसी भी शुभ कार्य को वर्जित कर दिया गया है, ताकि लोग स्‍वस्‍थ रहें और आने वाले त्‍योहार को स्वस्थ एवं आनन्दित रहकर माना सकें। होली के बाद मौसम बदल चुका होता है और गर्मी का असर तेजी से बढ़ने लगता है।

 क्या होता है होलाष्टक होलाष्टक मे क्या करें क्या न करें 

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

बच्चों को संस्कारवान बनाये एक रोचक शिक्षाप्रद कहानी

बच्चों को संस्कारवान बनाये


सन्तोष मिश्रा जी के यहाँ पहला लड़का हुआ तो पत्नी ने कहा, "बच्चे को गुरुकुल में शिक्षा दिलवाते है, मैं सोच रही हूँ कि गुरुकुल में शिक्षा देकर उसे धर्म ज्ञाता पंडित योगी बनाऊंगी।"


सन्तोष जी ने पत्नी से कहा, "पाण्डित्य पूर्ण योगी बना कर इसे भूखा मारना है क्या !! मैं इसे बड़ा अफसर बनाऊंगा ताकि दुनिया में एक कामयाबी वाला इंसान बने।।"


संतोष जी सरकारी बैंक में मैनेजर के पद पर थे ! पत्नी धार्मिक थी और इच्छा थी कि बेटा पाण्डित्य पूर्ण योगी बने, लेकिन सन्तोष जी नहीं माने।


दूसरा लड़का हुआ पत्नी ने जिद की, सन्तोष जी इस बार भी ना माने, तीसरा लड़का हुआ पत्नी ने फिर जिद की, लेकिन सन्तोष जी एक ही रट लगाते रहे, "कहां से खाएगा, कैसे गुजारा करेगा, और नही माने।"


चौथा लड़का हुआ, इस बार पत्नी की जिद के आगे सन्तोष जी हार गए , और अंततः उन्होंने गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दिलवाने के लिए वही भेज ही दिया ।


अब धीरे धीरे समय का चक्र घूमा, अब वो दिन आ गया जब बच्चे अपने पैरों पे मजबूती से खड़े हो गए, पहले तीनों लड़कों ने मेहनत करके सरकारी नौकरियां हासिल कर ली, पहला डॉक्टर, दूसरा बैंक मैनेजर, तीसरा एक गोवरमेंट कंपनी मेें जॉब करने लगा।


एक दिन की बात है सन्तोष जी  पत्नी से बोले, "अरे भाग्यवान ! देखा, मेरे तीनो होनहार बेटे सरकारी पदों पे हो गए न, अच्छी कमाई भी कर रहे है, तीनो की जिंदगी तो अब सेट हो गयी, कोई चिंता नही रहेगी अब इन तीनो को। लेकिन अफसोस मेरा सबसे छोटा बेटा गुुुरुकुल का आचार्य बन कर घर घर यज्ञ करवा रहा है, प्रवचन कर रहा है ! जितना वह छ: महीने में कमाएगा उतना मेरा एक बेटा एक महीने में कमा लेगा, अरे भाग्यवान ! तुमने अपनी मर्जी करवा कर बड़ी गलती की , तुम्हे भी आज इस पर पश्चाताप होता होगा , मुझे मालूम है, लेकिन तुम बोलती नही हो"।। 


पत्नी ने कहा, "हम मे से कोई एक गलत है, और ये आज दूध का दूध पानी का पानी हो जाना चाहिए, चलो अब हम परीक्षा ले लेते है चारों की, कौन गलत है कौन सही पता चल जाएगा ।।"


दूसरे दिन शाम के वक्त पत्नी ने बाल बिखरा , अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ कर और चेहरे पर एक दो नाखून के निशान मार कर आंगन मे बैठ गई और पतिदेव को अंदर कमरे मे छिपा दिया ..!!


बड़ा बेटा आया पूछा, "मम्मी क्या हुआ ?"

माँ ने जवाब दिया, "तुम्हारे पापा ने मारा है !"

पहला बेटा :- "बुड्ढा, सठिया गया है क्या ? कहां है ? बुलाओतो जरा।।" 

माँ ने कहा, "नही है , बाहर गए है !"

पहला बेटा - "आए तो मुझे बुला लेना , मैं कमरे मे हूँ, मेरा खाना निकाल दो मुझे भूख लगी है !" 


ये कहकर कमरे मे चला गया।


दूसरा बेटा आया पूछा तो माँ ने वही जवाब दिया,

दूसरा बेटा : "क्या पगला गए है इस बुढ़ापे मे , उनसे कहना चुपचाप अपनी बची खुची गुजार ले, आए तो मुझे बुला लेना और मैं खाना खाकर आया हूँ सोना है मुझे, अगर आये तो मुझे अभी मत जगाना, सुबह खबर लेता हूँ उनकी ।।", 


ये कह कर वो भी अपने कमरे मे चला गया ।


तीसरा बेटा आया पूछा तो आगबबूला हो गया, "इस बुढ़ापे मे अपनी औलादो के हाथ से जूते खाने वाले काम कर रहे है ! इसने तो मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं।" 

यह कर वह भी अपने कमरे मे चला गया ।।


संतोष जी अंदर बैठे बैठे सारी बाते सुन रहे थे, ऐसा लग रहा था कि जैसे उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो, और उसके आंसू नही रुक रहे थे, किस तरह इन बच्चो के लिए दिन रात मेहनत करके पाला पोसा, उनको बड़ा आदमी बनाया, जिसकी तमाम गलतियों को मैंने नजरअंदाज करके आगे बढ़ाया ! और ये ऐसा बर्ताव , अब तो बर्दाश्त ही नहीं हो रहा.....


इतने मे चौथा बेटा घर मे ओम् ओम् ओम् करते हुए अंदर आया।।


माँ को इस हाल मे देखा तो भागते हुए आया, पूछा, तो माँ ने अब गंदे गंदे शब्दो मे अपने पति को बुरा भला कहा तो चौथे बेटे ने माँ का हाथ पकड़ कर समझाया कि "माँ आप पिताजी की प्राण हो, वो आपके बिना अधूरे हैं,---अगर पिता जी ने आपको कुछ कह दिया तो क्या हुआ, मैंने पिता जी को आज तक आपसे बत्तमीजी से बात करते हुए नही देखा, वो आपसे हमेशा प्रेम से बाते करते थे, जिन्होंने इतनी सारी खुशिया दी, आज नाराजगी से पेश आए तो क्या हुआ, हो सकता है आज उनको किसी बात को लेकर चिंता रही हो, हो ना हो माँ ! आप से कही गलती जरूर हुई होगी, अरे माँ ! पिता जी आपका कितना ख्याल रखते है, याद है न आपको, छ: साल पहले जब आपका स्वास्थ्य ठीक नही था,  तो पिता जी ने कितने दिनों तक आपकी सेवा कीे थी, वही भोजन बनाते थे, घर का सारा काम करते थे, कपड़े धोते थे, तब आपने फोन करके मुझे सूचना दी थी कि मैं संसार की सबसे भाग्यशाली औरत हूँ, तुम्हारे पिता जी मेरा बहुत ख्याल करते हैं।"


इतना सुनते ही बेटे को गले लगाकर फफक फफक कर रोने लगी, सन्तोष जी आँखो मे आंसू लिए सामने खड़े थे।  


"अब बताइये क्या कहेंगे आप मेरे फैसले पर", पत्नी ने संतोष जी से पूछा।


सन्तोष जी ने तुरन्त अपने बेटे को गले लगा लिया, !


सन्तोष जी की धर्मपत्नी ने कहा, "ये शिक्षा इंग्लिश मीडियम स्कूलो मे नही दी जाती। माँ-बाप से कैसे पेश आना है, कैसे उनकी सेवा करनी है। ये तो गुरुकुल ही सिखा सकते हैं जहाँ वेद गीता रामायण जैसे ग्रन्थ पढाये जाते हैैं संस्कार दिये जाते हैं। 


अब सन्तोष जी को एहसास हुआ- जिन बच्चो पर लाखो खर्च करके डिग्रीया दिलाई वे सब जाली निकले ,  असल में ज्ञानी तो वो सब बच्चे है, जिन्होंने जमीन पर बैठ कर पढ़ा है, मैं कितना बड़ा नासमझ था, फिर दिल से एक आवाज निकलती है, काश मैंने चारो बेटो को गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दी होती ।


मातृमान पितृमान आचार्यावान् पुरुषो वेद:।।



सोमवार, 18 अगस्त 2025

'माता पिता कभी गलत नहीं होते' दिल को छू लेने वाली कहानी...

 

पिता  का अधिकार
माता पिता का अधिकार 


मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ चाट के ठेले पर दहीबड़े खा रहा था। अचानक ठेले वाले ने अपने बीस-बाईस साल के बेटे को खींचकर थप्पड़ मारा और झुँझलाते हुए बोला, "तुझे कितनी बार समझाया है कि कांजी के पानी वाला कुरछा दहीबड़ों में मत डाला कर। इसका अलग कुरछा रखा है न।"


पिता का यह व्यवहार देखकर मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा, "भाई साहब, यह सही बात नहीं है। यहाँ भरी सड़क पर जवान बेटे को थप्पड़ मारना मूर्खता है।" मेरी बात सुनकर ठेलेवाले की आँखों में आँसू आ गए। वह भरे गले से बोला, "क्या करूँ साहब, जब यह बार-बार गलती करता है तब मुझसे रहा नहीं जाता। एम.ए. कर रहा है फिर भी चूक करता है। शायद अब मैं भी ज़रा चिड़चिड़ा हो गया हूँ।"


पिता के आँसू देख लड़का मेरी ओर मुड़ा और गुस्से में बोला, "गलत मेरे पापा नहीं हैं साहब, गलत आप हैं जो एक बेटे के सामने बाप को गलत सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। यह मेरे पिता हैं। इनका मुझ पर पूरा हक है। ये चाहे मुझे थप्पड़ मारें या डाँटें, मुझे कोई शिकायत नहीं। जब मुझे शिकायत नहीं है तो आप क्यों टोक रहे हैं। और सुन लीजिए, बाप कभी गलत नहीं होता, हमेशा औलाद ही गलत होती है।" इतना कहकर उसने अपने पिता के आँसू पोंछे और बोला, "पापा, खुद को दुखी मत कीजिए। जब आप मुझे थप्पड़ मारते हैं तब मुझे अच्छा लगता है। बुरा तो तब लगता है जब आप कई दिनों तक मुझ पर हाथ नहीं उठाते। तब मुझे लगता है कि शायद अब आपको मेरी फिक्र ही नहीं रही।"


पत्नी और बच्चे मुझे अजीब नज़रों से देख रहे थे। जैसे मेरी पत्नी आँखों ही आँखों से कह रही हो, "अब समझ आया, दूसरों के पचड़े में पड़ने का नतीजा।" मैंने तुरंत पैसे चुकाए और परिवार को लेकर वहाँ से चल पड़ा। थोड़ी ही दूर जाकर बच्चे फिर पानीपुरी खाने लग गए, लेकिन मेरा मन कहीं और उलझा हुआ था। उस लड़के के शब्द मेरे भीतर नगाड़ों की तरह गूँज रहे थे और बरसों से बंद पड़े एक दरवाज़े को खोल रहे थे।


मुझे अपने पापा याद आ रहे थे। दस साल हो गए थे उनसे मिले हुए। वजह बस इतनी-सी थी कि एक दिन पापा ने मेरी पत्नी के सामने मुझे डाँट दिया था। मैं नाराज़ होकर बोला, "अब मैं बड़ा हो गया हूँ, अब आपकी यह डाँट अच्छी नहीं लगती।" यह सुनकर पापा गुस्से में अपनी जूती निकाल लाए और चिल्लाते हुए बोले, "मुझसे बड़ा हो गया है क्या? बता दूँ तुझे अभी।" वह जूती मेरे कान के पास से निकल गई। मैं बच गया था लेकिन भीतर आग भर गई थी। उसी रात मैंने ठान लिया कि अब इस घर में नहीं रहूँगा।


सुबह चार बजे पत्नी को लेकर मैं चुपके से घर छोड़ आया। माँ, पापा, भाई और भाभी सब पीछे रह गए। सब पापा से डरते थे, मगर मैं बोल जाता था। मुझे लगता था कि पापा गलत हैं। पर आज उस लड़के के शब्द गूँज रहे थे कि "बाप कभी गलत नहीं होता, हमेशा औलाद ही गलत होती है।" और मेरे भीतर सवाल उठ रहा था कि क्या सचमुच गलती मेरी ही थी?


उस रात नींद नहीं आई। पत्नी ने देखा तो बोली, "लगता है ठेले वाले लड़के की बात दिल को लग गई है।" मैं उदास होकर बोला, "हाँ, सच है। पापा कभी गलत नहीं होते, उनकी हर बात में हमारा भला छुपा होता है।" पत्नी ने प्यार से समझाया, "फिर चिंता क्यों? इस बार दिवाली गाँव चलते हैं। ससुर जी से मिलना होगा। देखना, वे आपको तुरंत माफ कर देंगे। अगर गुस्से में फिर एक आध जूता भी मार दें तो सह लेना, जैसे बचपन में सहा करते थे।"


सुबह जब हम गाँव पहुँचे तो माँ, भाई, भाभी और भतीजों के चेहरे खिल उठे। दस साल बाद मैंने घर की देहरी लाँघी थी। बैठक में पापा कम्बल ओढ़े सोए हुए थे। मैंने चुपचाप उनके चरण छुए। वे जागे, चश्मा लगाया और मुझे देखा। चेहरे पर वर्षों की नाराजगी थी। फिर बिना कुछ कहे कम्बल से चेहरा ढक लिया। मेरे पाँव वहीं जम गए। बोलने की हिम्मत नहीं थी।


मैंने बेटे बिट्टू को पास बुलाया। वह दादाजी से बहुत स्नेह करता था। उसने जाकर पापा का कम्बल खींचा और बोला, "दादू, देखो पापा आपसे बात करना चाहते हैं।" पापा ने पलटकर कहा, "अपने बाप से कह दो यहाँ से चला जाए। मुझे इससे कोई बात नहीं करनी।" मेरी आँखों में आँसू आ गए। मैं पापा के चरण पकड़कर चुपचाप रो पड़ा। बिट्टू बोला, "दादू, पापा रो रहे हैं।" मैं सिसकते हुए बोला, "माफ कर दो पापा। बहुत देर बाद समझ आया कि आप सही थे, गलती मेरी थी।"


पापा शायद इन्हीं शब्दों का इंतज़ार कर रहे थे। झटके से बैठकर बोले, "आ बेटा, बहुत दिन हो गए तुझे सीने से लगाए हुए। मन करता था कि सारी नाराजगी छोड़कर तेरे पास आ जाऊँ, मगर तू भी तो पत्थर बना हुआ था।" और फिर हम गले मिले। बरसों का बिछोह मिट गया। लगा जैसे जड़ों से कटे पेड़ को फिर से अपनी मिट्टी मिल गई हो, जैसे बरगद की छाँव में लौट आया हूँ।


उस साल की दिवाली सबसे यादगार थी। दस साल का वनवास खत्म हो गया था। पापा और माँ को मैं अपने साथ शहर ले आया। कुछ ही महीनों में पापा का स्वास्थ्य सँभल गया। चेहरे पर पहले जैसी ताजगी लौट आई।


सच है, माता-पिता ईश्वर स्वरूप होते हैं। उनके बिना जीवन अधूरा है।


माता पिता कभी गलत नहीं होते दिल को छू लेने वाली कहानी


सोमवार, 26 मई 2025

रोचक कहानी संपत्ति बड़ी या संस्कार


      

संपत्ति बड़ी या संस्कार

दक्षिण भारत में एक महान सन्त हुए तिरुवल्लुवर। वे अपने प्रवचनों से लोगों की समस्याओं का समाधान करते थे। इसलिए उन्हें सुनने के लिए दूर-दूर से लोग उनके पास आते थे।

      

एक बार वह एक नगर में पहुँचे। उनके प्रवचन को सुनने के पश्चात एक सेठ ने हाथ जोड़कर निराशा का भाव लिए उनसे कहा...


'गुरुवर, मैंने पाई-पाई जोड़ कर अपने इकलौते पुत्र के लिए अथाह संपत्ति एकत्र की है। मगर वह मेरी इस गाढ़े पसीने की कमाई को बड़ी बेदर्दी के साथ, बुरे व्यसनों में लुटा रहा है। मैं बहुत उलझन में हूँ। पता नहीं, भगवान किस अपराध के कारण मेरे साथ यह अन्याय कर रहा है।'

          

सन्त ने मुस्करा कर कहा, 'सेठ जी, तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए कितनी संपत्ति छोड़ी थी ?'


सेठ बोला, 'वह बहुत ही गरीब थे। उन्होंने मेरे लिए कुछ भी नहीं छोड़ा था।'


सन्त ने कहा, 'तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं छोड़ा, इसके बावजूद तुम इतने धनवान हो गए।

    

लेकिन अब तुम इतना धन जमा करने के बावजूद तुम यह समझ रहे हो कि तुम्हारा बेटा तुम्हारे बाद गरीबी में दिन काटेगा.?


सेठ ने अश्रुभरी आँखों से कहा, 'आप सच कह रहे हैं। परन्तु मुझसे गलती कहाँ हुई जो वह व्यसनों में डूबा रहता है।'

          

सन्त ने कहा, तुम यह समझकर धन कमाने में लगे रहे कि अपनी सन्तान के लिए दौलत का अम्बार लगा देना ही एक पिता का कर्तव्य है। इस चक्कर में तुमने अपने बेटे की पढ़ाई और संस्कारों के विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया।

     

मात-पिता का पुत्र के प्रति प्रथम कर्तव्य यही है कि वह उसे पहली पंक्ति में बैठने योग्य बना दे। बाकी तो सब कुछ अपनी योग्यता के बलबूते पर वह हासिल कर लेगा।'

          

सन्त की वाणी से सेठ की आँखें खुल गईं और उसने सिर्फ धन को महत्व न देकर अपने बेटे को सही रास्ते पर लाने के लिए उसे अच्छे अच्छे संस्कार देने का निर्णय किया।


 कहते हैं न की 

बच्चों को उनके पसंद के खिलौने नहीं दिये तो

थोड़ी देर रोयेंगे

 लेकिन 

अगर अच्छे संस्कार नहीं दिये तोबाद में वो जीवन भर रोयेंगे

 इसलिए

अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दिजिए

 क्योंकि

अच्छे संस्कार से ही अच्छा संसार ( जीवन ) बनेगा

 रोचक कहानी संपत्ति बड़ी या संस्कार 

बुधवार, 19 मार्च 2025

गुरु कृपा कितने प्रकार से होती है ???


 गुरु कृपा




१ स्मरण से 

२ दृष्टि से 

३ शब्द से 

४ स्पर्श से 


१  

जैसे कछुवी रेत के भीतर अंडा देती है पर खुद पानी के भीतर रहती हुई उस अंडे को याद करती रहती है तो उसके स्मरण से अंडा पक जाता है।

ऐसे ही गुरु की याद करने मात्र से शिष्य को ज्ञान हो जाता है।

यह है स्मरण दीक्षा।


२  

दूसरा जैसे मछली जल में अपने अंडे को थोड़ी थोड़ी देर में देखती रहती है तो देखने मात्र से अंडा पक जाता है।

ऐसे ही गुरु की कृपा दृष्टि से शिष्य को ज्ञान हो जाता है।

यह दृष्टि दीक्षा है।


३  

तीसरा जैसे कुररी  पृथ्वी पर अंडा देती है ,और आकाश में शब्द करती हुई घूमती है तो उसके शब्द से अंडा पक जाता है। 

ऐसे ही गुरु अपने शब्दों से शिष्य को ज्ञान करा देता है। यह शब्द दीक्षा है ।।


४  

चौथा जैसे मयूरी अपने अंडे पर बैठी रहती है तो उसके स्पर्श से अंडा पक जाता है ।

ऐसे ही गुरु के हाथ के स्पर्श से शिष्य को ज्ञान हो जाता है । 

यह स्पर्श दीक्षा है।।


Impotant

रोज सुबह ये 1 काम करने से जीवन में शांति और सफलता आती है (धार्मिक मान्यता)

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