मंगलवार, 27 जनवरी 2026

बच्चों को संस्कारवान बनाये एक रोचक शिक्षाप्रद कहानी

बच्चों को संस्कारवान बनाये


सन्तोष मिश्रा जी के यहाँ पहला लड़का हुआ तो पत्नी ने कहा, "बच्चे को गुरुकुल में शिक्षा दिलवाते है, मैं सोच रही हूँ कि गुरुकुल में शिक्षा देकर उसे धर्म ज्ञाता पंडित योगी बनाऊंगी।"


सन्तोष जी ने पत्नी से कहा, "पाण्डित्य पूर्ण योगी बना कर इसे भूखा मारना है क्या !! मैं इसे बड़ा अफसर बनाऊंगा ताकि दुनिया में एक कामयाबी वाला इंसान बने।।"


संतोष जी सरकारी बैंक में मैनेजर के पद पर थे ! पत्नी धार्मिक थी और इच्छा थी कि बेटा पाण्डित्य पूर्ण योगी बने, लेकिन सन्तोष जी नहीं माने।


दूसरा लड़का हुआ पत्नी ने जिद की, सन्तोष जी इस बार भी ना माने, तीसरा लड़का हुआ पत्नी ने फिर जिद की, लेकिन सन्तोष जी एक ही रट लगाते रहे, "कहां से खाएगा, कैसे गुजारा करेगा, और नही माने।"


चौथा लड़का हुआ, इस बार पत्नी की जिद के आगे सन्तोष जी हार गए , और अंततः उन्होंने गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दिलवाने के लिए वही भेज ही दिया ।


अब धीरे धीरे समय का चक्र घूमा, अब वो दिन आ गया जब बच्चे अपने पैरों पे मजबूती से खड़े हो गए, पहले तीनों लड़कों ने मेहनत करके सरकारी नौकरियां हासिल कर ली, पहला डॉक्टर, दूसरा बैंक मैनेजर, तीसरा एक गोवरमेंट कंपनी मेें जॉब करने लगा।


एक दिन की बात है सन्तोष जी  पत्नी से बोले, "अरे भाग्यवान ! देखा, मेरे तीनो होनहार बेटे सरकारी पदों पे हो गए न, अच्छी कमाई भी कर रहे है, तीनो की जिंदगी तो अब सेट हो गयी, कोई चिंता नही रहेगी अब इन तीनो को। लेकिन अफसोस मेरा सबसे छोटा बेटा गुुुरुकुल का आचार्य बन कर घर घर यज्ञ करवा रहा है, प्रवचन कर रहा है ! जितना वह छ: महीने में कमाएगा उतना मेरा एक बेटा एक महीने में कमा लेगा, अरे भाग्यवान ! तुमने अपनी मर्जी करवा कर बड़ी गलती की , तुम्हे भी आज इस पर पश्चाताप होता होगा , मुझे मालूम है, लेकिन तुम बोलती नही हो"।। 


पत्नी ने कहा, "हम मे से कोई एक गलत है, और ये आज दूध का दूध पानी का पानी हो जाना चाहिए, चलो अब हम परीक्षा ले लेते है चारों की, कौन गलत है कौन सही पता चल जाएगा ।।"


दूसरे दिन शाम के वक्त पत्नी ने बाल बिखरा , अपनी साड़ी का पल्लू फाड़ कर और चेहरे पर एक दो नाखून के निशान मार कर आंगन मे बैठ गई और पतिदेव को अंदर कमरे मे छिपा दिया ..!!


बड़ा बेटा आया पूछा, "मम्मी क्या हुआ ?"

माँ ने जवाब दिया, "तुम्हारे पापा ने मारा है !"

पहला बेटा :- "बुड्ढा, सठिया गया है क्या ? कहां है ? बुलाओतो जरा।।" 

माँ ने कहा, "नही है , बाहर गए है !"

पहला बेटा - "आए तो मुझे बुला लेना , मैं कमरे मे हूँ, मेरा खाना निकाल दो मुझे भूख लगी है !" 


ये कहकर कमरे मे चला गया।


दूसरा बेटा आया पूछा तो माँ ने वही जवाब दिया,

दूसरा बेटा : "क्या पगला गए है इस बुढ़ापे मे , उनसे कहना चुपचाप अपनी बची खुची गुजार ले, आए तो मुझे बुला लेना और मैं खाना खाकर आया हूँ सोना है मुझे, अगर आये तो मुझे अभी मत जगाना, सुबह खबर लेता हूँ उनकी ।।", 


ये कह कर वो भी अपने कमरे मे चला गया ।


तीसरा बेटा आया पूछा तो आगबबूला हो गया, "इस बुढ़ापे मे अपनी औलादो के हाथ से जूते खाने वाले काम कर रहे है ! इसने तो मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं।" 

यह कर वह भी अपने कमरे मे चला गया ।।


संतोष जी अंदर बैठे बैठे सारी बाते सुन रहे थे, ऐसा लग रहा था कि जैसे उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई हो, और उसके आंसू नही रुक रहे थे, किस तरह इन बच्चो के लिए दिन रात मेहनत करके पाला पोसा, उनको बड़ा आदमी बनाया, जिसकी तमाम गलतियों को मैंने नजरअंदाज करके आगे बढ़ाया ! और ये ऐसा बर्ताव , अब तो बर्दाश्त ही नहीं हो रहा.....


इतने मे चौथा बेटा घर मे ओम् ओम् ओम् करते हुए अंदर आया।।


माँ को इस हाल मे देखा तो भागते हुए आया, पूछा, तो माँ ने अब गंदे गंदे शब्दो मे अपने पति को बुरा भला कहा तो चौथे बेटे ने माँ का हाथ पकड़ कर समझाया कि "माँ आप पिताजी की प्राण हो, वो आपके बिना अधूरे हैं,---अगर पिता जी ने आपको कुछ कह दिया तो क्या हुआ, मैंने पिता जी को आज तक आपसे बत्तमीजी से बात करते हुए नही देखा, वो आपसे हमेशा प्रेम से बाते करते थे, जिन्होंने इतनी सारी खुशिया दी, आज नाराजगी से पेश आए तो क्या हुआ, हो सकता है आज उनको किसी बात को लेकर चिंता रही हो, हो ना हो माँ ! आप से कही गलती जरूर हुई होगी, अरे माँ ! पिता जी आपका कितना ख्याल रखते है, याद है न आपको, छ: साल पहले जब आपका स्वास्थ्य ठीक नही था,  तो पिता जी ने कितने दिनों तक आपकी सेवा कीे थी, वही भोजन बनाते थे, घर का सारा काम करते थे, कपड़े धोते थे, तब आपने फोन करके मुझे सूचना दी थी कि मैं संसार की सबसे भाग्यशाली औरत हूँ, तुम्हारे पिता जी मेरा बहुत ख्याल करते हैं।"


इतना सुनते ही बेटे को गले लगाकर फफक फफक कर रोने लगी, सन्तोष जी आँखो मे आंसू लिए सामने खड़े थे।  


"अब बताइये क्या कहेंगे आप मेरे फैसले पर", पत्नी ने संतोष जी से पूछा।


सन्तोष जी ने तुरन्त अपने बेटे को गले लगा लिया, !


सन्तोष जी की धर्मपत्नी ने कहा, "ये शिक्षा इंग्लिश मीडियम स्कूलो मे नही दी जाती। माँ-बाप से कैसे पेश आना है, कैसे उनकी सेवा करनी है। ये तो गुरुकुल ही सिखा सकते हैं जहाँ वेद गीता रामायण जैसे ग्रन्थ पढाये जाते हैैं संस्कार दिये जाते हैं। 


अब सन्तोष जी को एहसास हुआ- जिन बच्चो पर लाखो खर्च करके डिग्रीया दिलाई वे सब जाली निकले ,  असल में ज्ञानी तो वो सब बच्चे है, जिन्होंने जमीन पर बैठ कर पढ़ा है, मैं कितना बड़ा नासमझ था, फिर दिल से एक आवाज निकलती है, काश मैंने चारो बेटो को गुरुकुल में शिक्षा दीक्षा दी होती ।


मातृमान पितृमान आचार्यावान् पुरुषो वेद:।।



सोमवार, 18 अगस्त 2025

'माता पिता कभी गलत नहीं होते' दिल को छू लेने वाली कहानी...

 

पिता  का अधिकार
माता पिता का अधिकार 


मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ चाट के ठेले पर दहीबड़े खा रहा था। अचानक ठेले वाले ने अपने बीस-बाईस साल के बेटे को खींचकर थप्पड़ मारा और झुँझलाते हुए बोला, "तुझे कितनी बार समझाया है कि कांजी के पानी वाला कुरछा दहीबड़ों में मत डाला कर। इसका अलग कुरछा रखा है न।"


पिता का यह व्यवहार देखकर मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा, "भाई साहब, यह सही बात नहीं है। यहाँ भरी सड़क पर जवान बेटे को थप्पड़ मारना मूर्खता है।" मेरी बात सुनकर ठेलेवाले की आँखों में आँसू आ गए। वह भरे गले से बोला, "क्या करूँ साहब, जब यह बार-बार गलती करता है तब मुझसे रहा नहीं जाता। एम.ए. कर रहा है फिर भी चूक करता है। शायद अब मैं भी ज़रा चिड़चिड़ा हो गया हूँ।"


पिता के आँसू देख लड़का मेरी ओर मुड़ा और गुस्से में बोला, "गलत मेरे पापा नहीं हैं साहब, गलत आप हैं जो एक बेटे के सामने बाप को गलत सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। यह मेरे पिता हैं। इनका मुझ पर पूरा हक है। ये चाहे मुझे थप्पड़ मारें या डाँटें, मुझे कोई शिकायत नहीं। जब मुझे शिकायत नहीं है तो आप क्यों टोक रहे हैं। और सुन लीजिए, बाप कभी गलत नहीं होता, हमेशा औलाद ही गलत होती है।" इतना कहकर उसने अपने पिता के आँसू पोंछे और बोला, "पापा, खुद को दुखी मत कीजिए। जब आप मुझे थप्पड़ मारते हैं तब मुझे अच्छा लगता है। बुरा तो तब लगता है जब आप कई दिनों तक मुझ पर हाथ नहीं उठाते। तब मुझे लगता है कि शायद अब आपको मेरी फिक्र ही नहीं रही।"


पत्नी और बच्चे मुझे अजीब नज़रों से देख रहे थे। जैसे मेरी पत्नी आँखों ही आँखों से कह रही हो, "अब समझ आया, दूसरों के पचड़े में पड़ने का नतीजा।" मैंने तुरंत पैसे चुकाए और परिवार को लेकर वहाँ से चल पड़ा। थोड़ी ही दूर जाकर बच्चे फिर पानीपुरी खाने लग गए, लेकिन मेरा मन कहीं और उलझा हुआ था। उस लड़के के शब्द मेरे भीतर नगाड़ों की तरह गूँज रहे थे और बरसों से बंद पड़े एक दरवाज़े को खोल रहे थे।


मुझे अपने पापा याद आ रहे थे। दस साल हो गए थे उनसे मिले हुए। वजह बस इतनी-सी थी कि एक दिन पापा ने मेरी पत्नी के सामने मुझे डाँट दिया था। मैं नाराज़ होकर बोला, "अब मैं बड़ा हो गया हूँ, अब आपकी यह डाँट अच्छी नहीं लगती।" यह सुनकर पापा गुस्से में अपनी जूती निकाल लाए और चिल्लाते हुए बोले, "मुझसे बड़ा हो गया है क्या? बता दूँ तुझे अभी।" वह जूती मेरे कान के पास से निकल गई। मैं बच गया था लेकिन भीतर आग भर गई थी। उसी रात मैंने ठान लिया कि अब इस घर में नहीं रहूँगा।


सुबह चार बजे पत्नी को लेकर मैं चुपके से घर छोड़ आया। माँ, पापा, भाई और भाभी सब पीछे रह गए। सब पापा से डरते थे, मगर मैं बोल जाता था। मुझे लगता था कि पापा गलत हैं। पर आज उस लड़के के शब्द गूँज रहे थे कि "बाप कभी गलत नहीं होता, हमेशा औलाद ही गलत होती है।" और मेरे भीतर सवाल उठ रहा था कि क्या सचमुच गलती मेरी ही थी?


उस रात नींद नहीं आई। पत्नी ने देखा तो बोली, "लगता है ठेले वाले लड़के की बात दिल को लग गई है।" मैं उदास होकर बोला, "हाँ, सच है। पापा कभी गलत नहीं होते, उनकी हर बात में हमारा भला छुपा होता है।" पत्नी ने प्यार से समझाया, "फिर चिंता क्यों? इस बार दिवाली गाँव चलते हैं। ससुर जी से मिलना होगा। देखना, वे आपको तुरंत माफ कर देंगे। अगर गुस्से में फिर एक आध जूता भी मार दें तो सह लेना, जैसे बचपन में सहा करते थे।"


सुबह जब हम गाँव पहुँचे तो माँ, भाई, भाभी और भतीजों के चेहरे खिल उठे। दस साल बाद मैंने घर की देहरी लाँघी थी। बैठक में पापा कम्बल ओढ़े सोए हुए थे। मैंने चुपचाप उनके चरण छुए। वे जागे, चश्मा लगाया और मुझे देखा। चेहरे पर वर्षों की नाराजगी थी। फिर बिना कुछ कहे कम्बल से चेहरा ढक लिया। मेरे पाँव वहीं जम गए। बोलने की हिम्मत नहीं थी।


मैंने बेटे बिट्टू को पास बुलाया। वह दादाजी से बहुत स्नेह करता था। उसने जाकर पापा का कम्बल खींचा और बोला, "दादू, देखो पापा आपसे बात करना चाहते हैं।" पापा ने पलटकर कहा, "अपने बाप से कह दो यहाँ से चला जाए। मुझे इससे कोई बात नहीं करनी।" मेरी आँखों में आँसू आ गए। मैं पापा के चरण पकड़कर चुपचाप रो पड़ा। बिट्टू बोला, "दादू, पापा रो रहे हैं।" मैं सिसकते हुए बोला, "माफ कर दो पापा। बहुत देर बाद समझ आया कि आप सही थे, गलती मेरी थी।"


पापा शायद इन्हीं शब्दों का इंतज़ार कर रहे थे। झटके से बैठकर बोले, "आ बेटा, बहुत दिन हो गए तुझे सीने से लगाए हुए। मन करता था कि सारी नाराजगी छोड़कर तेरे पास आ जाऊँ, मगर तू भी तो पत्थर बना हुआ था।" और फिर हम गले मिले। बरसों का बिछोह मिट गया। लगा जैसे जड़ों से कटे पेड़ को फिर से अपनी मिट्टी मिल गई हो, जैसे बरगद की छाँव में लौट आया हूँ।


उस साल की दिवाली सबसे यादगार थी। दस साल का वनवास खत्म हो गया था। पापा और माँ को मैं अपने साथ शहर ले आया। कुछ ही महीनों में पापा का स्वास्थ्य सँभल गया। चेहरे पर पहले जैसी ताजगी लौट आई।


सच है, माता-पिता ईश्वर स्वरूप होते हैं। उनके बिना जीवन अधूरा है।


माता पिता कभी गलत नहीं होते दिल को छू लेने वाली कहानी


सोमवार, 26 मई 2025

रोचक कहानी संपत्ति बड़ी या संस्कार


      

संपत्ति बड़ी या संस्कार

दक्षिण भारत में एक महान सन्त हुए तिरुवल्लुवर। वे अपने प्रवचनों से लोगों की समस्याओं का समाधान करते थे। इसलिए उन्हें सुनने के लिए दूर-दूर से लोग उनके पास आते थे।

      

एक बार वह एक नगर में पहुँचे। उनके प्रवचन को सुनने के पश्चात एक सेठ ने हाथ जोड़कर निराशा का भाव लिए उनसे कहा...


'गुरुवर, मैंने पाई-पाई जोड़ कर अपने इकलौते पुत्र के लिए अथाह संपत्ति एकत्र की है। मगर वह मेरी इस गाढ़े पसीने की कमाई को बड़ी बेदर्दी के साथ, बुरे व्यसनों में लुटा रहा है। मैं बहुत उलझन में हूँ। पता नहीं, भगवान किस अपराध के कारण मेरे साथ यह अन्याय कर रहा है।'

          

सन्त ने मुस्करा कर कहा, 'सेठ जी, तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए कितनी संपत्ति छोड़ी थी ?'


सेठ बोला, 'वह बहुत ही गरीब थे। उन्होंने मेरे लिए कुछ भी नहीं छोड़ा था।'


सन्त ने कहा, 'तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं छोड़ा, इसके बावजूद तुम इतने धनवान हो गए।

    

लेकिन अब तुम इतना धन जमा करने के बावजूद तुम यह समझ रहे हो कि तुम्हारा बेटा तुम्हारे बाद गरीबी में दिन काटेगा.?


सेठ ने अश्रुभरी आँखों से कहा, 'आप सच कह रहे हैं। परन्तु मुझसे गलती कहाँ हुई जो वह व्यसनों में डूबा रहता है।'

          

सन्त ने कहा, तुम यह समझकर धन कमाने में लगे रहे कि अपनी सन्तान के लिए दौलत का अम्बार लगा देना ही एक पिता का कर्तव्य है। इस चक्कर में तुमने अपने बेटे की पढ़ाई और संस्कारों के विकास पर कोई ध्यान नहीं दिया।

     

मात-पिता का पुत्र के प्रति प्रथम कर्तव्य यही है कि वह उसे पहली पंक्ति में बैठने योग्य बना दे। बाकी तो सब कुछ अपनी योग्यता के बलबूते पर वह हासिल कर लेगा।'

          

सन्त की वाणी से सेठ की आँखें खुल गईं और उसने सिर्फ धन को महत्व न देकर अपने बेटे को सही रास्ते पर लाने के लिए उसे अच्छे अच्छे संस्कार देने का निर्णय किया।


 कहते हैं न की 

बच्चों को उनके पसंद के खिलौने नहीं दिये तो

थोड़ी देर रोयेंगे

 लेकिन 

अगर अच्छे संस्कार नहीं दिये तोबाद में वो जीवन भर रोयेंगे

 इसलिए

अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दिजिए

 क्योंकि

अच्छे संस्कार से ही अच्छा संसार ( जीवन ) बनेगा

 रोचक कहानी संपत्ति बड़ी या संस्कार 

बुधवार, 19 मार्च 2025

गुरु कृपा कितने प्रकार से होती है ???


 गुरु कृपा




१ स्मरण से 

२ दृष्टि से 

३ शब्द से 

४ स्पर्श से 


१  

जैसे कछुवी रेत के भीतर अंडा देती है पर खुद पानी के भीतर रहती हुई उस अंडे को याद करती रहती है तो उसके स्मरण से अंडा पक जाता है।

ऐसे ही गुरु की याद करने मात्र से शिष्य को ज्ञान हो जाता है।

यह है स्मरण दीक्षा।


२  

दूसरा जैसे मछली जल में अपने अंडे को थोड़ी थोड़ी देर में देखती रहती है तो देखने मात्र से अंडा पक जाता है।

ऐसे ही गुरु की कृपा दृष्टि से शिष्य को ज्ञान हो जाता है।

यह दृष्टि दीक्षा है।


३  

तीसरा जैसे कुररी  पृथ्वी पर अंडा देती है ,और आकाश में शब्द करती हुई घूमती है तो उसके शब्द से अंडा पक जाता है। 

ऐसे ही गुरु अपने शब्दों से शिष्य को ज्ञान करा देता है। यह शब्द दीक्षा है ।।


४  

चौथा जैसे मयूरी अपने अंडे पर बैठी रहती है तो उसके स्पर्श से अंडा पक जाता है ।

ऐसे ही गुरु के हाथ के स्पर्श से शिष्य को ज्ञान हो जाता है । 

यह स्पर्श दीक्षा है।।


मंगलवार, 18 मार्च 2025

चार-युग और उनकी विशेषताएं

 


चार-युग और उनकी विशेषताएं


 'युग' शब्द का अर्थ होता है एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि। जैसे  सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग आदि । 

यहाँ हम चारों युगों का वर्णन करेंगें। युग वर्णन से तात्पर्य है कि उस युग में किस प्रकार से व्यक्ति का जीवन, आयु, ऊँचाई, एवं उनमें होने वाले अवतारों के बारे में विस्तार से परिचय देना। प्रत्येक युग के वर्ष प्रमाण और उनकी विस्तृत जानकारी कुछ इस तरह है -


                            सत्ययुग


 यह प्रथम युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है -

इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 17,28,000 वर्ष होतीहै 

इस युग में मनुष्य की आयु – 1,00,000 वर्ष होती है ।

मनुष्य की लम्बाई – 32 फिट (लगभग) [21 हाथ]

सत्ययुग का तीर्थ – पुष्कर है ।

इस युग में पाप की मात्र – 0 विश्वा अर्थात् (0%) होती है ।

इस युग में पुण्य की मात्रा – 20 विश्वा अर्थात् (100%) होती है ।

इस युग के अवतार – मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह (सभी अमानवीय अवतार हुए) है ।

अवतार होने का कारण – शंखासुर का वध एंव वेदों का उद्धार, पृथ्वी का भार हरण, हरिण्याक्ष दैत्य का वध, हिरण्यकश्यपु का वध एवं प्रह्लाद को सुख देने के लिए।

इस युग की मुद्रा – रत्नमय है ।

इस युग के पात्र – स्वर्ण के है ।


             त्रेतायुग


यह द्वितीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –

इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 12,96,000 वर्ष होती है ।

इस युग में मनुष्य की आयु – 10,000 वर्ष होती है ।

मनुष्य की लम्बाई – 21 फिट (लगभग) [ 14 हाथ ]

त्रेतायुग का तीर्थ – नैमिषारण्य है ।

इस युग में पाप की मात्रा – 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है ।

इस युग में पुण्य की मात्रा – 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है ।

इस युग के अवतार – वामन, परशुराम, राम (राजा दशरथ के घर)

अवतार होने के कारण – बलि का उद्धार कर पाताल भेजा, मदान्ध क्षत्रियों का संहार, रावण-वध एवं देवों को बन्धनमुक्त करने के लिए ।

इस युग की मुद्रा – स्वर्ण है ।

इस युग के पात्र – चाँदी के है ।


              द्वापरयुग


 यह तृतीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –

इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 8.64,000 वर्ष होती है ।

इस युग में मनुष्य की आयु - 1,000 होती है ।

मनुष्य लम्बाई – 11 फिट (लगभग) [ 7 हाथ ]

द्वापरयुग का तीर्थ – कुरुक्षेत्र है ।

इस युग में पाप की मात्रा – 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है ।

इस युग में पुण्य की मात्रा – 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है ।

इस युग के अवतार – कृष्ण, (देवकी के गर्भ से एंव नंद के घर पालन-पोषण), बुद्ध (राजा के घर)।

अवतार होने के कारण – कंसादि दुष्टो का संहार एंव गोपों की भलाई, दैत्यो को मोहित करने के लिए ।

इस युग की मुद्रा – चाँदी है ।

इस युग के पात्र – ताम्र के हैं ।


           कलियुग



 यह चतुर्थ युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –

इस युग की पूर्ण आयु अर्थात् कालावधि – 4,32,000 वर्ष होती है ।

इस युग में मनुष्य की आयु – 100 वर्ष होती है ।

मनुष्य की लम्बाई – 5.5 फिट (लगभग) [3.5 हाथ]

कलियुग का तीर्थ – गंगा है ।

इस युग में पाप की मात्रा – 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है ।

इस युग में पुण्य की मात्रा – 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है ।

इस युग के अवतार – कल्कि (ब्राह्मण विष्णु यश के घर) ।

अवतार होने के कारण – मनुष्य जाति के उद्धार अधर्मियों का विनाश एंव धर्म कि रक्षा के लिए।

इस युग की मुद्रा – लोहा है।

इस युग के पात्र – मिट्टी के है।


सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

हनुमान जी के उत्तर को सुनके आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे


हनुमान जी के उत्तर को सुनके आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे



यदि आप हनुमान जी की भक्ति करते है और उनके ऊपर विश्वास करते है तो आपको चिंता करने की जरुरत नहीं बताता हूं क्यों ----ध्यान से सुनियेगा .....  इसका उत्तर स्वयं हनुमान जी ने ही दिया है। ......  

 जब लक्ष्मण जी को शक्ति लगी और राम जी अपना धैर्य खो रहे थे, लगातार रो रहे थे और हनुमान जी से बोल रहे थे  

यदि तुम संजीवनी नहीं ला पाए तो क्या होगा ???.... इसका उत्तर स्वयं हनुमान जी ने दिया है 

 तब हनुमान जी को उनकी ऐसी स्थिति देखी नहीं गई और राम जी से बोले - प्रभु आप चिंता ना करैं। 

"मैं अंजनि पुत्र हनुमान प्रकाश के वेग से जाऊंगा और द्रोणागिरी पर्वत को समय के पहले ही उठा ले आउगा" यदि 

"इसमें अमृत नहीं मिला तो उसी वेग स्वर्ग जाउगा और वह से देवताओं से अमृत छीनकर यहां ले आउंगा " यदि वहां भी 

नहीं मिला तो जहां से अमृत निकला था पाताल लोक चला जाउगा वहां से ले आउगा और यदि वहाँ भी नहीं मिला तो मैं 

चन्द्रमा को पकड़ के लछमण जी के मुँह मे निचोड़ दूँगा (ऐसा बोला जाता है कि चन्द्रमा मे अमृत का रस है ) और यदि 

"वहाँ से भी नहीं निकला तो सूर्य को फिर से निगल जाऊंगा " और इतने पर भी कुछ नहीं हुआ तो  यमलोक जाके 

धर्मराज के धर्मपाश को ही तोड़ दूंगा। और इससे भी कुछ न हुआ तो काल को समाप्त कर दूंगा। "

सोचिये इतना सब केवल स्वयं भू भोलेनाथ ही बोल सकते है क्योकि हनुमान जी शिवजी का ही रूप है।  

तो फिर आप क्यों इतनी चिंता करते है हनुमान जी के रहते।  उनके ऊपर विश्वास बनाये रखिये और सब संकटों को संकटमोचन पर ही छोड़  दीजिये।

हनुमान जी के उत्तर को सुनके आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे 

शनिवार, 28 दिसंबर 2024

चरित्र (प्रेरणादायक कथा)


चरित्र (प्रेरणादायक कथा)



"चरित्र का मतलब है किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत और नैतिक विशेषताएं, आदतें, व्यवहार, और मूल्य| यह किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का अहम हिस्सा होता है और उसके विचारों, कार्यों, और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है| चरित्र, किसी व्यक्ति की पहचान का अहम हिस्सा होता है"



एक राजपुरोहित थे। वे अनेक विधाओं के ज्ञाता होने के कारण राज्य में अत्यधिक प्रतिष्ठित थे। बड़े-बड़े विद्वान उनके प्रति आदरभाव रखते थे|  पर उन्हें अपने ज्ञान का लेशमात्र भी अहंकार नहीं था। उनका विश्वास था कि ज्ञान और चरित्र का योग ही लौकिक एवं परमार्थिक उन्नति का सच्चा पथ है। प्रजा की तो बात ही क्या स्वयं राजा भी उनका सम्मान करते थे और उनके आने पर उठकर आसन प्रदान करते थे।


एक बार राजपुरोहित के मन में जिज्ञासा हुई कि राजदरबार में उन्हें आदर और सम्मान उनके ज्ञान के कारण मिलता है अथवा चरित्र के कारण? इसी जिज्ञासा के समाधान हेतु उन्होंने एक योजना बनाई। योजना को क्रियान्वित करने के लिए राजपुरोहित राजा का खजाना देखने गए।

 

खजाना देखकर लौटते समय उन्होंने खजाने में से पाँच बहुमूल्य मोती उठाए और उन्हें अपने पास रख लिया। खजांची देखता ही रह गया। राजपुरोहित के मन में धन का लोभ हो सकता है। खजांची ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था।


 उसका वह दिन उसी उधेड़बुन में बीत गया।


दूसरे दिन राजदरबार से लौटते समय राजपुरोहित पुन: खजाने की ओर मुड़े तथा उन्होंने फिर पाँच मोती उठाकर अपने पास रख लिए। अब तो खजांची के मन में राजपुरोहित के प्रति पूर्व में जो श्रद्धा थी वह क्षीण होने लगी। तीसरे दिन जब पुन: वही घटना घटी तो उसके धैर्य का बाँध टूट गया। उसका संदेह इस विश्वास में बदल गया कि राजपुरोहित की ‍नीयत निश्चित ही खराब हो गई है।


उसने राजा को इस घटना की विस्तृत जानकारी दी। राजा को इस सूचना से बड़ा आघात पहुँचा। उनके मन में राजपुरोहित के प्रति आदरभाव की जो प्रतिमा पहले से प्रतिष्ठित थी, वह चूर-चूर होकर बिखर गई। चौथे दिन जब राजपुरोहित सभा में आए तो राजा पहले की तरह न सिंहासन से उठे और न उन्होंने राजपुरोहित का अभिवादन किया, यहाँ तक कि राजा ने उनकी ओर देखा तक नहीं। राजपुरोहित तत्काल समझ गए कि अब योजना रंग ला रही है।


 उन्होंने जिस उद्देश्य से मोती उठाए थे, वह उद्देश्य अब पूरा होता नजर आने लगा था। यही सोचकर राजपुरोहित चुपचाप अपने आसन पर बैठ गए। राजसभा की कार्यवाही पूरी होने के बाद जब अन्य दरबारियों की भाँति राजपुरोहित भी उठकर अपने घर जाने लगे तो राजा ने उन्हें कुछ देर रुकने का आदेश दिया। सभी सभासदों के चले जाने के बाद राजा ने उनसे पूछा - 'सुना है आपने खजाने में कुछ गड़बड़ी की है।'


इस प्रश्न पर जब राजपुरोहित चुप रहे तो राजा का आक्रोश और बढ़ा। इस बार वे कुछ ऊँची आवाज में बोले -'क्या आपने खजाने से कुछ मोती उठाए हैं?'


राजपुरोहित ने मोती उठाने की बात को स्वीकार किया। राजा का अगला प्रश्न था - 'आपने कितेने मोती उठाए और कितनी बार?' राजा ने पुन: पूछा - 'वे मोती कहाँ हैं?'


राजपुरोहित ने एक पुड़िया जेब से निकाली और राजा के सामने रख दी जिसमें कुल पंद्रह मोती थे। राजा के मन में आक्रोश, दुख और आश्चर्य के भाव एक साथ उभर आए।


राजा बोले - 'राजपुरोहित जी आपने ऐसा गलत काम क्यों किया? क्या आपको अपने पद की गरिमा का लेशमात्र भी ध्यान नहीं रहा। ऐसा करते समय क्या आपको लज्जा नहीं आई? आपने ऐसा करके अपने जीवनभर की प्रतिष्ठा खो दी। आप कुछ तो बोलिए,


आपने ऐसा क्यों किया?


राजा की अकुलाहट और उत्सुकता देखकर राजपुरोहित ने राजा को पूरी बात विस्तार से बताई तथा प्रसन्नता प्रकट करते हुए राजा से कहा - 'राजन् केवल इस बात की परीक्षा लेने हेतु कि ज्ञान और चरित्र में कौन बड़ा है, मैंने आपके खजाने से मोती उठाए थे अब मैं निर्विकल्प हो गया हूँ। यही नहीं आज चरित्र के प्रति मेरी आस्था पहले की अपेक्षा और अधिक बढ़ गई है।


आपसे और आपकी प्रजा से अभी तक मुझे जो प्यार और सम्मान मिला है। वह सब ज्ञान के कारण नहीं ‍अपितु चरित्र के ही कारण था। आपके खजाने में सबसे अधिक बहुमू्ल्य वस्तु सोना-चाँदी या हीरा-मोती नहीं बल्कि चरित्र है।


अत: मैं चाहता हूँ कि आप अपने राज्य में चरित्र संपन्न लोगों को अधिकाधिक प्रोत्साहन दें ताकि चरित्र का मूल्य उत्तरोत्तर बढ़ता रहे। कहा जाता है -


धन गया,कुछ नहीं गया,

स्वास्थ्‍य गया,कुछ गया!

चरित्र गया तो सब कुछ गया..!!


Impotant

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