बुधवार, 8 जुलाई 2026

धर्मात्मा तोते और देवराज इंद्र की कहानी | बुरे समय में साथ निभाने की सीख


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महाभारत की धर्मात्मा तोते और देवराज इंद्र की प्रेरणादायक कहानी
महाभारत की यह प्रेरणादायक कथा सिखाती है कि जिसने सुख में हमारा साथ दिया हो, उसे कठिन समय में कभी नहीं छोड़ना चाहिए। सच्ची निष्ठा और कृतज्ञता ही धर्म का मार्ग है।



क्या आपने कभी सोचा है कि सच्ची मित्रता और वफादारी की पहचान कब होती है? सुख के समय हर कोई साथ होता है, लेकिन कठिन समय में जो साथ निभाए, वही सच्चा अपना कहलाता है। महाभारत की यह प्रेरणादायक कथा हमें निष्ठा, कृतज्ञता और धर्म का अद्भुत संदेश देती है।


धर्मात्मा तोते और देवराज इंद्र की कथा

देवराज इंद्र और धर्मात्मा तोते की यह कथा महाभारत से है। कहानी कहती है| अगर किसी के साथ ने अच्छा वक्त दिखाया है तो बुरे वक्त में उसका साथ छोड़ देना ठीक नहीं।


पेड़ क्यों सूख गया?

 एक शिकारी ने शिकार पर तीर चलाया। तीर पर सबसे खतरनाक जहर लगा हुआ था। पर निशाना चूक गया। तीर हिरण की जगह एक फले-फूले पेड़ में जा लगा। पेड़ में जहर फैला। वह सूखने लगा। उस पर रहने वाले सभी पक्षी एक-एक कर उसे छोड़ गए।


तोते ने पेड़ क्यों नहीं छोड़ा? 

पेड़ के कोटर में एक धर्मात्मा तोता बहुत बरसों से रहा करता था। तोता पेड़ छोड़ कर नहीं गया, बल्कि अब तो वह ज्यादातर समय पेड़ पर ही रहता। दाना-पानी न मिलने से तोता भी सूख कर कांटा हुआ जा रहा था। बात देवराज इंद्र तक पहुंची। मरते वृक्ष के लिए अपने प्राण दे रहे तोते को देखने के लिए इंद्र स्वयं वहां आए।


देवराज इंद्र क्यों प्रसन्न हुए?

धर्मात्मा तोते ने उन्हें पहली नजर में ही पहचान लिया। इंद्र ने कहा- 'देखो भाई इस पेड़ पर न पत्ते हैं, न फूल, न फल। अब इसके दोबारा हरे होने की कौन कहे| बचने की भी कोई उम्मीद नहीं है। जंगल में कई ऐसे पेड़ हैं| जिनके बड़े-बड़े कोटर पत्तों से ढके हैं। पेड़ फल-फूल से भी लदे हैं। वहां से सरोवर भी पास है। तुम इस पेड़ पर क्या कर रहे हो| वहां क्यों नहीं चले जाते?'

तोते ने जवाब दिया, 'देवराज मैं इसी पर जन्मा, इसी पर बढ़ा, इसके मीठे फल खाए। इसने मुझे दुश्मनों से कई बार बचाया। इसके साथ मैंने सुख भोगे हैं। आज इस पर बुरा वक्त आया तो मैं अपने सुख के लिए इसे त्याग दूं? जिसके साथ सुख भोगे, दुख भी उसके साथ भोगूंगा, मुझे इसमें आनंद है। आप देवता होकर भी मुझे ऐसी बुरी सलाह क्यों दे रहे हैं?' यह कह कर तोते (तोते ने संत का इशारा समझ लिया |)ने तो जैसे इंद्र की बोलती ही बंद कर दी। तोते की दो-टूक सुन कर इंद्र प्रसन्न हुए, बोले, 'मैं तुमसे प्रसन्न हूं, कोई वर मांग लो।

              ' तोता बोला, 'मेरे इस प्यारे पेड़ को पहले की तरह ही हरा-भरा कर दीजिए।' देवराज ने पेड़ को न सिर्फ अमृत से सींच दिया, बल्कि उस पर अमृत बरसाया भी। पेड़ में नई कोंपलें फूटीं। वह पहले की तरह हरा हो गया, उसमें खूब फल भी लग गए। तोता उस पर बहुत दिनों तक रहा, मरने के बाद देवलोक को चला गया।


कहानी से मिलने वाली सीख

 युधिष्ठिर को यह कथा सुना कर भीष्म बोले- 'अपने आश्रयदाता के दुख को जो अपना दुख समझता है, उसके कष्ट मिटाने स्वयं ईश्वर आते हैं। बुरे वक्त में (उम्मीद का दियाव्यक्ति भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाता है। जो उस समय उसका साथ देता है, उसके लिए वह अपने प्राणों की बाजी लगा देता है। किसी के सुख के साथी बनो न बनो, दुख के साथी जरूर बनो। यही धर्मनीति है और कूटनीति भी।


बुरे समय में साथ निभाना क्यों जरूरी है?

अच्छे समय मे तो सभी साथ देते है लेकिन बुरे समय मे जो साथ दे वही सच्चा मित्र और शुभ चिंतक होता है।  बुरा समय ही सही और गलत का अंतर बताता है। और जिसने अच्छे समय मे साथ दिया हो यदि उसका बुरा समय आ गया तो उसका साथ तो जरूर देना चाहिए।     


महाभारत हमें क्या सिखाती है?

महाभारत बहुत कुछ सिखाती है  लेकिन ये कहानी महाभारत से ली गई है जिसमे युधिष्ठिर को भीष्म पितामह एक कहानी के माध्यम से सीखा रहे है कि सबकी ज़िंदगी मे दोनों समय आता है लेकिन किस समय कैसे रहना है ये बहुत जरुरी है। 


FAQs

Q. धर्मात्मा तोते की कहानी किस ग्रंथ में मिलती है?
A   महाभारत 

Q. देवराज इंद्र ने तोते को क्या वरदान दिया?
A  दुबारा अच्छा होने की 

Q. इस कहानी की मुख्य शिक्षा क्या है?
A  बुरे समय मे किसी का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। 

Q. बुरे समय में साथ निभाना क्यों आवश्यक है?
A  जो अपना होगा वही साथ निभाएगा। 

Q. महाभारत हमें निष्ठा के बारे में क्या सिखाती है?
A  निष्ठा संस्कार से आती है। 
 
Q. बच्चों को यह कहानी क्यों पढ़ानी चाहिए?
A  इसलिए क्योकि मतलब होने तक ही साथ नहीं देना चाहिए जब कोई विपत्ति मे है तो उस समय भी साथ रहना उतना ही जरुरी है जितना अच्छे समय थे। 


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