शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2023

श्राद्ध पर्व की पौराणिक कथा श्राद्ध प्रथा का आरंभ पितृपक्ष की कथा पितरों की मुक्ति के लिए

 

जय श्री राम   

 पितृ पक्ष की पौराणिक कथा :-

श्राद्ध या पितृ पक्ष के बारे में तो हम सभी जानते है की ये क्यों मनाये जाते है। लेकिन श्राद्ध पर्व की कहानी शायद आपको पता नहीं होगी। आज हम आपको श्राद्ध की कथा बताने जा रहे है।

 श्राद्ध प्रथा का आरंभ:-

श्राद्ध पर्व की पौराणिक कथा



 महाभारत में प्रसंग आता है कि मृत्यु के उपरांत दानवीर कर्ण को चित्रगुप्त ने मोक्ष देने से इंकार कर दिया था। तब कर्ण ने चित्रगुप्त से पूछा कि मैंने अपनी सारी सम्पदा सदैव दान पुण्य में ही समर्पित की है तो फिर मुझ पर यह कैसा ऋण शेष रह गया है, तब चित्रगुप्त ने बताया, राजन आपने देव ऋण और ऋषि ऋण तो चुकता कर दिया परंतु आप पर पितृ ऋण शेष है। आपने अपने काल में सम्पदा एवं सोने का दान किया है। अन्न का दान नहीं किया। जब तक आप यह ऋण नहीं उतारते आपको मोक्ष मिलना संभव नहीं। इसके उपरांत धर्मराज ने दानवीर कर्ण को व्यवस्था दी कि आप 16 दिन के लिए पृथ्वी पर जाकर अपने ज्ञात एवं अज्ञात पितरों को प्रसन्न करने के लिए विधिवत श्राद्ध-तर्पण तथा पिंड दान करके आइए तभी आपको मोक्ष की प्राप्ति होगी। दानवीर कर्ण ने वैसा ही किया तभी उन्हें मोक्ष मिला। 
किंवदंती है कि तभी से श्राद्ध की प्रथा आरंभ हुई। 

जन्म लेने के उपरांत प्राणी पर तीन प्रकार का ऋण होता है। 
पहला देव ऋण, दूसरा ऋषि ऋण और तीसरा पितृ ऋण। पितृ पक्ष के इन 16 दिनों में श्राद्ध प्रक्रिया में उपस्थित होकर तीनों ऋणों से मुक्त हो सकते हैं। किंवदंती है कि चंद्रमा की ऊर्ध्व कक्षा में पितृ लोक स्थित है जहां हमारे पितृ निवास करते हैं जिन्हें हम आंखों से नहीं देख सकते। जीवात्मा जब इस स्थूल शरीर से पृथक होता है उस स्थिति को हम मृत्यु कहते हैं। 


श्राद्ध की कथा :-

पुराणों के अनुसार, जोगे तथा भोगे दो भाई थे। जोगे धनी था और भोगे निर्धन। दोनों में अत्यंत प्रेम था। जोगे की पत्नी को धन का घमंड था, लेकिन भोगे की पत्नी सरल हृदय की थी।

पितृ पक्ष के आने पर जोगे की पत्नी ने उससे पितरों का श्राद्ध करने के लिए कहा तो जोगे इसे बेकार का काम समझकर टालने लगा, लेकिन उसकी पत्नी जानती थी कि यदि ऐसा नहीं किया तो लोग बातें बनाएंगे।


पितृपक्ष की कथा



साथ ही उसे अपने मायके वालों को दावत पर बुलाने और अपनी अमीरी दिखाने का यह सही अवसर लगा।

अंत में वो बोली- आप मेरी परेशानी की वजह से ऐसा कह रहे हैं, तो मैं सहायता के लिए भोगे की पत्नी को बुला लूंगी।

दोनों मिलकर सारा काम कर लेंगे।' फिर उसने जोगे को अपने मायके न्यौता देने के लिए भेजा। दूसरे दिन उसके बुलाने पर सुबह-सवेरे ही भोगे की पत्नी आकर काम में लग गई।

उसने भोजन तैयार किया, अनेक तरह के पकवान बनाए फिर सभी काम खत्म कर अपने घर आ गई। उसे भी अपने घर पर पितरों का श्राद्ध-तर्पण करना था।

इस मौके पर जोगे की पत्नी ने उसे नहीं रोका और ना वह रुकी। दोपहर के समय पितर भूमि पर उतरे। जोगे-भोगे के पितर पहले जोगे के यहां गए तो उन्होंने देखा कि उसके ससुराल वाले पहले से ही भोजन पर जुटे हुए हैं।

आखिरी में वो भोगे के घर गए जहाँ पितरों के नाम पर 'अगियारी' दे दी गई थी। पितरों ने अगियारी की राख चाटी और भूखे ही नदी के तट पर पहुंच गए।

थोड़ी देर में सभी पितर एकत्र हुए और अपने-अपने यहां के श्राद्धों की तारीफें करने लगे। जोगे-भोगे के पितरों ने अपनी आपबीती कही। फिर वो सोचने लगे- यदि भोगे समर्थ होता तो  उन्हें भूखा नहीं रहना पड़ता,लेकिन भोगे के घर में तो दो वक़्त की रोटी भी खाने को नहीं थी।

यही सब सोचकर उन्हें भोगे पर दया आ गई। अचानक वो ख़ुशी में चिल्लाने लगे की भोगे के घर धन हो जाए। भोगे भी धनवान हो जाए। शाम हो गई थी और भोगे के बच्चों भी भूखे थे।

उन्होंने अपंनी मां से कहा- भूख लगी है। तब उन्हें टालने के लिए भोगे की पत्नी ने कहा- 'जाओ! आंगन में हौदी औंधी रखी है, जाओ उसे खोल लो और जो भी मिले, बांटकर खा लेना।'

बच्चे वहां जाते है तो देखते हैं कि हौदी मोहरों से भरी पड़ी है। वे दौड़े कर मां के पास पहुंचे और सारी बातें बताईं। आंगन में जब भोगे की पत्नी ने यह सब देखा तो वह भी हैरान हो गई।

इस तरह भोगे भी धनवान हो गया, धन पाकर वह कभी घमंडी नहीं हुआ। अगले साल का पितृ पक्ष आया। भोगे की पत्नी ने श्राद्ध के दिन छप्पन प्रकार के भोग बनाएं।

ब्राह्मणों को अपने घर बुलाकर श्राद्ध किया। भोजन कराया और दक्षिणा दी। सोने-चांदी के बर्तनों में जेठ-जेठानी को भोजन कराया। इससे पितर बहुत प्रसन्न और तृप्त हुए।


श्राद्ध करना क्यों जरूरी है

श्राद्ध करना जरूरी है| हर साल पितृ पक्ष के दौरान अपने पितरों के नाम का श्राद्ध उनके परिवार को करना चाहिए. लेकिन जो लोग ऐसा नहीं करते उन्हें पितृदोष लगता है. ऐसे लोगों के घर में दरिद्रता आ जाती है, आर्थिक हानि होती है, तरक्की के मार्ग खुलने से पहले बंद हो जाते हैं और जो लोग पितृ पक्ष के दौरान अपने पितरों के नाम का श्राद्ध तर्पण करते हैं. उनके लिए उनकी पसंद के पकवान बनाते हैं उन पर पितरों की कृपा हमेशा बनीं रहती है. श्राद्ध करना क्यों जरूरी है|

F A Q ---------

प्रश्न १- किसने शुरू किया श्राद्ध ?
उत्तर - हालांकि महाभारत के अनुशासन पर्व की एक कथा के मुताबिक माना जाता है कि महर्षि निमि ने सबसे पहले श्राद्ध की शुरुआत की थी और उन्हें श्राद्ध का उपदेश अत्रि मुनि ने दिया था.









प्रश्न २ - श्राद्ध की पूजा कैसे की जाती है?
उत्तर - साफ कपड़े पहनकर पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध और दान का संकल्प लें. मूल रूप से श्राद्ध के दिन भूखे रहकर पूर्ण श्रद्धा पूर्वक सात्विक भोजन तैयार करें. गोग्रास, पंच ग्रास आदि अलग रखकर थाली में भोजन परोसकर मृत परिजन की फोटो के सामने परोसें. हाथ जोड़कर उनसे दया दृष्टि करते हुए पधारने और भोजन ग्रहण करने की प्रार्थना करें.

प्रश्न ३ - पितरों को कौन सा फूल चढ़ाना चाहिए?
# पितृ पक्ष में किन फूलों से करें पितरों का तर्पण'

उत्तर - श्राद्ध की पूजा में कमल, जूही, चंपा, मालती और सफेद फूलों का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा तुलसी और भृंगराज भी श्राद्ध पूजा में उपयोग किए जाते हैं।


प्रश्न ४ - पितरों को पानी कौन कौन दे सकते हैं?
# कौन कर सकता है पितरों का श्राद्ध या तर्पण

हिंदू धर्म के अनुसार, घर के मुखिया या प्रथम पुरुष अपने पितरों का श्राद्ध कर सकता है। अगर मुखिया नहीं है, तो घर का कोई अन्य पुरुष अपने पितरों को जल चढ़ा सकता है। इसके अलावा पुत्र और नाती भी तर्पण कर सकता है। शास्त्रों के अनुसार, पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए।

प्रश्न ५ - पितरों के लिए कौन सा दीपक लगाना चाहिए?
ईशान कोण में जलाएं घी का दीपक: रोजाना घर के ईशान कोण (उत्तर और पूर्व के बीच की दिशा) में गाय के घी का दीपक जलाने से मां लक्ष्‍मी आप पर कृपा बरसाएंगी. इससे घर में कभी आर्थिक समस्‍याएं नहीं होती हैं. रोज ऐसा करने से पितृ बेहद प्रसन्‍न होते हैं और पितरों के आशीर्वाद से सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं.






कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

THANK YOU

Impotant

क्या होता है होलाष्टक ? होलाष्टक मे क्या करें क्या न करें ? होलाष्टक के वैज्ञानिक तर्क

  होलाष्टक फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से शुरू होने वाले 8 दिनों की अवधि को कहते हैं, जो Holi से पहले आती है।  यह अवधि होलिका दहन से...