शनिवार, 9 मार्च 2024

शनिदेव जी की ऐसी कहानी जो आपके बहुत से प्रश्नो का उत्तर खुद ही देगी ......

 भक्तवर हनुमान् और शनिदेव 


भक्तवर हनुमान् और शनिदेव


एक बार की बात है। भक्तराज हनुमान् रामसेतु के समीप ध्यान में अपने परम प्रभु श्रीराम की भुवनमोहिनी झाँकी का दर्शन करते हुए आनन्दविह्वल थे। ध्यान मे होने के करण उनको बाहः जगत की सुध ही नहीं थी | 


उसी समय सूर्यपुत्र शनिदेव  समुद्रतट पर टहल रहे थे। उन्हें अपनी शक्ति एवं पराक्रम का अत्यधिक अहंकार था। वे मन-ही-मन सोच रहे थे कि 'मुझ में अतुलनीय शक्ति है। सृष्टि में मेरी समता करने वाला कोई नहीं है।'


इस प्रकार विचार करते हुए शनिदेव की दृष्टि ध्यानमग्न श्रीरामभक्त हनुमान्पर पड़ी। उन्होंने वज्रांग महावीरको पराजित करनेका निश्चय किया। युद्धका निश्चयकर शनिदेव आंजनेयके समीप पहुँचे। उस समय सूर्यदेवकी तीक्ष्णतम किरणों में शनिदेव का रंग अत्यधिक काला हो गया था। भीषणतम आकृति थी उनकी।


पवनकुमार के समीप पहुँचकर शनिदेव ने अत्यन्त कर्कश स्वरमें कहा- 'हे वानर ! मैं प्रख्यात शक्तिशाली शनि तुम्हारे सम्मुख उपस्थित हूँ और तुमसे युद्ध करना चाहता हूँ। तुम पाखण्ड त्यागकर खड़े हो जाओ।'


तिरस्कार करनेवाली अत्यन्त कटुवाणी सुनते ही भक्तराज हनुमान् जी ने अपने नेत्र खोले और बड़ी ही शालीनता एवं शान्तिसे पूछा- 'महाराज! आप कौन हैं और यहाँ पधारनेका आपका उद्देश्य क्या है?'


शनिदेव ने अहंकारपूर्वक उत्तर दिया- 'मैं परम तेजस्वी सूर्य का परम पराक्रमी पुत्र शनि हूँ। जगत् मेरा नाम सुनते ही काँप उठता है। मैंने तुम्हारे बल-पौरुषकी कितनी ही गाथाएँ सुनी हैं। इसलिये मैं तुम्हारी शक्तिकी परीक्षा लेने आया हूँ। सावधान हो जाओ, मैं तुम्हारी राशिपर आ रहा हूँ।'


अंजनीनन्दन ने अत्यन्त विनम्रतापूर्वक कहा- 'शनिदेव ! मैं वृद्ध हो गया हूँ और अपने प्रभुका ध्यान कर रहा हूँ। इसमें व्यवधान मत डालिये। कृपापूर्वक अन्यत्र चले जाइये।'


शनिदेव सगर्व कहा- 'मैं कहीं जाकर लौटना नहीं जानता और जहाँ जाता हूँ, वहाँ अपना प्राबल्य और प्राधान्य तो स्थापित ही कर देता हूँ।'


कपिश्रेष्ठने शनिदेवसे बार-बार प्रार्थना की- 'महात्मन् ! मैं वृद्ध हो गया हूँ। युद्ध करनेकी शक्ति मुझमें नहीं है। मुझे अपने भगवान् श्रीरामका स्मरण करने दीजिये। आप यहाँसे जाकर किसी और वीर को ढूँढ़ लीजिये। मेरे भजन - ध्यानमें विघ्न उपस्थित मत कीजिये।'


‘कायरता तुम्हें शोभा नहीं देती।' अत्यन्त उद्धत शनिदेव ने हनुमान जी को व्यंग्यपूर्वक तीक्ष्णस्वरमें कहा- 'तुम्हारी स्थिति देखकर मेरे मन में करुणाका संचार हो रहा है, किंतु मैं तुमसे युद्ध अवश्य करूँगा।'


इतना ही नहीं, शनिदेव ने महावली रामभक्त बजरंगबली जी का हाथ पकड़ लिया और उन्हें युद्धके लिये ललकारने लगे। हनुमान् जी ने झटककर अपना हाथ छुड़ा लिया। युद्धलोलुप शनि पुनः भक्तवर हनुमान्का हाथ पकड़कर उन्हें युद्धके लिये खींचने लगे।


'आप नहीं मानेंगे।' धीरे-से कहते हुए पिशाचग्रह- घातक कपिवरने अपनी पूँछ बढ़ाकर शनिदेव को उसमें लपेटना प्रारम्भ किया। कुछ ही क्षणोंमें अविनीत सूर्यपुत्र शनिदेव सुदृढ़ पुच्छमें आकण्ठ आबद्ध हो गये। उनका अहंकार, उनकी शक्ति एवं उनका पराक्रम व्यर्थ सिद्ध हुआ। वे सर्वथा असहाय और निरुपाय होकर दृढ़तम बन्धनकी पीड़ासे छटपटा रहे थे।


'अब रामसेतु की परिक्रमाका समय हो गया।' अंजनानन्दन उठे और दौड़ते हुए सेतुकी प्रदक्षिणा करने लगे। शनिदेवकी सम्पूर्ण शक्तिसे भी उनका बन्धन शिथिल न हो सका। भक्तराज हनुमान् जी के दौड़ने से उनकी विशाल पूँछ वानर-भालुओं द्वारा रखे गये शिलाखण्डोंपर गिरती जा रही थी। वीरवर हनुमान् दौड़ते हुए जान- बूझकर भी अपनी पूँछ शिलाखण्डों पर पटक देते थे।


शनिदेव की बड़ी अद्भुत एवं दयनीय दशा थी। शिलाखण्डों पर पटके जाने से उनका शरीर रक्त से लथपथ हो गया था । उनकी पीड़ा की कोई सीमा नहीं थी और उग्रवेग हनुमान् जी  परिक्रमा में कहीं विराम नहीं दीख रहा था। तब शनि अत्यन्त कातर स्वरमें प्रार्थना करने लगे - 'करुणामय भक्तराज ! मुझ पर कृपा कीजिये। अपनी उद्दण्डता का दण्ड मैं पा गया हूँ । आप मुझे मुक्त कीजिये। मेरे प्राण छोड़ दीजिये।'


दयामूर्ति हनुमान् जी खड़े हुए। शनि का अंग-प्रत्यंग लहूलुहान हो गया था। उनके रग रग मे असह्य पीड़ा हो रही थी। भक्तवत्सल वीरशिरोमणि हनुमान जी ने शनिदेव से कहा- 'यदि तुम मेरे भक्तों की राशि पर कभी न जाने का वचन दो तो मैं तुम्हें मुक्त कर सकता हूँ और यदि तुमने ऐसा नहीं किया तो मैं तुम्हें कठोरतम दण्ड प्रदान करूँगा।'


'सुरवन्दित वीरवर ! निश्चय ही मैं आपके भक्त की राशि पर कभी नहीं जाऊँगा।' पीड़ासे छटपटाते हुए शनिदेव ने अत्यन्त आतुरतासे प्रार्थना की - 'आप कृपापूर्वक मुझे शीघ्र बन्धनमुक्त कर दीजिये।'


शरणागतवत्सल भक्तप्रवर हनुमान् जी ने  शनिदेव को छोड़ दिया। शनिदेव ने अपना शरीर सहलाते हुए गर्वापहारी मारुतात्मजके चरणोंमें सादर प्रणाम किया और वे चोट की असह्य पीड़ा से व्याकुल होकर अपनी देह पर लगाने के लिये तेल माँगने लगे। उन्हें जो तेल प्रदान करता है, उसे वे सन्तुष्ट होकर आशिष देते हैं। कहते हैं, इसी कारण अब भी शनिदेव को तेल चढ़ाया जाता है । 


 इसीलिए ज्योतिष में शनि मंगल की मेष राशि में नीच के हो जाते हैं और शनि की मकर राशि में मंगल उच्चता को प्राप्त होते हैं। 

 शनिदेव जी की ऐसी कहानी जो आपके बहुत से प्रश्नो का उत्तर खुद ही देगी ...... 


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